एक दिन यूं ही बैठे-बैठे ईश्वर ने अपनी लीला रची और बना दिये खूब सारे जीव, नदी-नाले, पर्वत-पहाड़, समुद्र और पेड़-पौंधे. पेड़ की पत्तियों को भरा हरे रंग से, पहाड़ों को भरा पेड़ों से और उनके बीच से गुजारी नीले पानी वाली नदी. बड़ा सा हाथी बनाया और साथ में बनाई उसने चीटी. गुर्राने वाले बाघ बनाये तो ज़हर से भरे हुये सांप भी छोड़ दिये. एक-दूसरे के सापेक्ष शक्ति से भरे इन जीवों में उसने बनाया एक इंसान जिसे शक्ति से ज्यादा बुद्धि दी.
(Folklore of Uttarakhand)
ईश्वर की लीला में ही रची गयी बकरी. बकरी जिसे इंसान अपने घर ले जाता पाल-पोसकर खिलाता और बड़ा करता फिर एक दिन उसे ही खा जाता. जंगल में भी बाघ जिस दिन चाहे बकरी की गर्दन पर झपट जाता और उसे अपना शिकार बना लेता. ईश्वर की रची इस दुनिया में बकरी ख़ुद को सबसे असहाय समझती. बकरी को लगता ईश्वर ने हर चीज उसके ऊपर राज करने को बनाई है.
परेशान होकर बकरी एक बार लोमड़ी के पास गयी और उससे पूछा- मौसी मौत की तलवार हर समय परे सिर पर लटकती रहती है मैं क्या करूं? लोमड़ी ने सुझाव दिया- तुम अपनी शिकायत लेकर ईश्वर के पास क्यों नहीं चली जाती? बकरी ने हामी में गर्दन हिलाई और तय किया कि अब वह ईश्वर से जाकर ही अपनी शिकायत दर्ज करेगी. पेड़ से गिरी पत्तियों को अपने मुंह से खींचते हुये उसने ईश्वर के दरबार का रुख किया.
ईश्वर अपनी रची लीला का आनन्द ले रहे थे कि तभी अचानक बकरी दरबार में दाखिल हुई और रुआंसी आँखों से पूछने लगी- आपने मुझे दुनिया में भेजा ही क्यों हैं ऐसी दुनिया में जहां हर कोई मुझसे ज्यादा ताकतवर है. मुझे ऐसी दुनिया में बकरी की तरह नहीं रहना जहां बाघ मुझे शिकार बनाना चाहता है और आदमी मुझे खा जाना चाहता है.
(Folklore of Uttarakhand)
रोती बिलखती बकरी अपनी बात भी पूरी न कह सकी थी कि ईश्वर ने उससे कहा- तुम रो क्यों रही हो? रोना तो कमजोर होना है. तुम बिलकुल अनाड़ी हो. तुम इतनी कमजोर लग रही हो कि तुम्हें देखकर मुझे तुमको कच्चा चबा जाने का मन कर रहा है.
बकरी अचंभित होकर ईश्वर को देखने लगी. उससे बस इतना ही कहा गया कि हे ईश्वर आप ऐसे शब्द कैसे कह सकते हैं? ईश्वर ने उसकी तरफ देखा और मुस्कुरा कर पूछा- क्या तुम हरी पत्तियां नहीं चबाती हो?
बकरी अब भी अचंभित होकर ईश्वर को देख रही थी तब ईश्वर ने समझाते हुये आगे कहा- देखो बकरी, जीवन इसलिए नहीं दिया गया है कि तुम उसपर रो सको. जीवन संघर्ष के लिए है. वापस जाओ और अपना संघर्ष जियो. कमजोर मत बनो. ख़ुद की रक्षा करने का रास्ता ख़ुद तलाशो. ऐसा कहते हुये ईश्वर ने बकरी की पीठ पर प्यार भरी थपकी दी.
बकरी ईश्वर के दरबार से लौटी और उसने तय किया कि आज के बाद वह कभी अपनी जिन्दगी पर नहीं रोयेगी और मजबूत बनेगी. अब बकरी को समझ आ गया था कमजोर की मदद स्वयं ईश्वर भी नहीं करता.
(Folklore of Uttarakhand)
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