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ये आकाशवाणी है, अब आप देवकी नंदन पांडे से समाचार सुनिए…

ये आकाशवाणी है, अब आप देवकी नंदन पांडे से समाचार सुनिए… रात के पौने नौ बजे भारत के घर-घर में दशकों तक इस पंक्ति को सुना गया. अपने जीवन काल में ही लैजेंड बन गये देवकी नंदन पांडे की आवाज को भारत का बच्चा-बच्चा पहचानता था. एक लम्बे समय तक भारत के लोगों ने अन्तराष्ट्रीय और राष्ट्रीय समाचार सिर्फ एक आवाज में सुने देवकी नंदन पांडे की आवाज में. फिर चाहे ख़ुशी की ख़बर हो या गम की ख़बर देश ने समाचार देवकी नंदन पांडे की आवाज में ही जाना.
(Devki Nandan Pandey)

जवाहरलाल नेहरु के निधन का समाचार, संजय गांधी की हत्या का समाचार, इंदिरा गांधी की हत्या का समाचार सभी देश ने देवकी नंदन पांडे की आवाज में ही सुने. देवकी नंदन पांडे को देश की आवाज कहा जाता था.   

कानपुर में जन्में देवकी नंदन पांडे के पिता डॉक्टर थे. देवकी नंदन पांडे के जन्म के चार साल बाद वह रिटायर हो गये और अल्मोड़ा रहने लगे. चार साल के बाद देवकी नंदन पांडे का बचपन अल्मोड़ा में ही बीता. देवकी नंदन पांडे का गांव अल्मोड़ा के पाटिया गांव में है. 1921 में जन्मे देवकी नंदन पांडे चार भाइयों में सबसे बड़े थे. पिता की मृत्यु के बाद भाइयों की जिम्मेदारी उन पर आ गयी. लखनऊ में पहले उन्होंने ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट में नौकरी की. बाद में 1943 में उन्होंने आकाशवाणी लखनऊ से कैजुअल एनाउंसर और ड्रामा आर्टिस्ट के रूप में अपने करियर की शुरुआत की.

साल 1948 में उन्होंने दिल्ली के आकाशवाणी में हिंदी समाचार सेवा में काम शुरु किया. 21 मार्च 1948 में उन्होंने अपना पहला समाचार पढ़ा. रिटायरमेंट के बाद वह दिल्ली में ही रहते थे. उनकी मां अपने जीवन के आखिरी सात आठ साल पहले तक अपने गांव में ही रहती थी परन्तु जीवन के अंतिम दिनों में अपने ख़राब स्वास्थ्य के कारण दिल्ली आ गयी.
(Devki Nandan Pandey)

देवकी नंदन पांडे के साथी त्रिलोकीनाथ बीबीसी में रेहान फजल की रिपोर्ट में कहते हैं:

ऊँचा माथा, भीतर तक झाँकती शफ़्फ़ाक आँखें, चेहरे पर झलकता आत्मविश्वास, साफ़गोई- ये सब मिला कर देवकीनंदन पांडे का शानदार व्यक्तित्व बनता था. सफ़ेद लंबा कुर्ता पायजामा, एक चप्पल और सर्दियों पर इस पर एक काली अचकन. घड़ी बाँधते नहीं थे और कभी कलम भी नहीं रखते थे, फिर भी ड्यूटी पर हमेशा चाकचौबंद. वक्त के पूरे पाबंद. काम के प्रति ईमानदारी इतनी कि बुलेटिन शुरू होने से पाँच मिनट पहले ही उठ कर स्टूडियो चले जाते थे. नई पीढ़ी के वाचक तो दो मिनट पहले जाने में अपनी हेठी समझते हैं.

देवकी नंदन पांडे के पुत्र सुधीर पांडे अपने पिता को याद करते हुये कहते हैं:

वह अक्सर घर पर हमें अशुद्ध बोलने पर टोका करते थे. मैं मेरी बहन हम सभी को उन्होंने कई बार टोका. उस समय हमें बुरा लगता था कि क्या बार-बार टोकते रहते हैं लेकिन अब मुझे अहसास होता है कि वह एक किस्म की प्रोसेस थी जिसकी बदौलत आज भी मेरी जबान इतनी साफ है.

देवकी नंदन पांडे को एक बार किसी की चुनौती पर समाचार का प्रसारण कुछ इस तरह भी किया-  यह देवकीनंदन पांडे है. अब आप आकाशवाणी से समाचार सुनिए. अपने जीवन का एक किस्सा सुनाते हुये कहते हैं कि

एक बार होलियों में मैंने खूब भांग पी ली. उन दिनों 9.15 बजे समाचार बुलेटिन का प्रसारण हुआ करता था. जब मैं गया तो वहां सभी ने पूछा कि पांडे जी आप पढ़ लेंगे. डर तो मुझे भी लगा पर मैंने एक नजर में पढ़ा और पूरी गंभीरता से एक ही बार में बिना किसी गलती के प्रसारण कर दिया. उसके अगले दिन डायरेक्टर साहब ने मेरी पीठ भी थपथपाई. उस जमाने में लोग ऐसा करते थे.

अपने जीवन के महत्वपूर्ण क्षणों को याद करते हुये वह कहते हैं-

एक बार यूनियन के किसी मुद्दे पर हम अपनी समस्या एक कागज पर लिखकर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिलने गये. उनके घर में बड़ी भीड़ रहती थी मुल्क के कोने-कोने से लोग वहां आते थे. मेरे साथ आये शीतांशु ने कागज दिखाकर मिसेज गांधी से कहा हम रेडियो से आये हैं ये देवकीनंदन पांडे हैं ये प्रोब्लम हमारा है… मिसेज गांधी ने तुंरत कहा- अच्छा तो आप हैं देवकी नंदन पांडे. तब मुझे कुछ गर्व सा भी हुआ.    
(Devki Nandan Pandey)

बीबीसी की रिपोर्ट में उमेश जोशी के हवाले से कहा गया है कि

वो एक बेहतरीन गुर बताते थे जो आज के 99 फ़ीसदी समाचार वाचकों और एंकरों को शायद नहीं मालूम होगा. वो कहते थे कि एक चुटकी बजाओ, उतना समय दो वाक्यों के बीच होना चाहिए. दो चुटकी जितना समय दो पैराग्राफ़ और तीन चुटकी जितना समय दो ख़बरों के बीच देना ज़रूरी है. वर्ना भागवत कथा पढ़ने और समाचार पढ़ने में कोई अंतर नहीं रहेगा.

देवकी नंदन पांडे ने भीष्म साहनी के उपन्यास ‘तमस’ पर बनी फिल्म में भी काम किया. इससे पहले अशोक आहूजा जब उनसे अपनी फिल्म में कलाकारों के लिये सलाह लेने आये तो उसी मुलाकात के बाद उन्होंने देवकी नंदन पांडे को अपनी फिल्म में अभिनय के लिये भी पूछा. आधारशिला उनकी पहली फिल्म थी. तमस और आधारशिला के अतिरिक्त उन्हें ‘बड़े घर की बेटी’ में अभिनय करते देखा गया.

यह दुर्भाग्य है कि उत्तराखंड राज्य के इस नगीने को आज तक उत्तराखंड सरकार या भारत सरकार ने आज तक वह सम्मान नहीं दिया जिसके वह हक़दार हैं.
(Devki Nandan Pandey)

संदर्भ: बीबीसी और प्रसार भारती आर्काइव

काफल ट्री डेस्क

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