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उत्तराखंड में लोगों के लिये दलित हत्या कोई बड़ी बात नहीं है

क्या अगर आप से कोई कहे कि एक व्यक्ति की हत्या इसलिए की गयी है क्योंकि वह कुर्सी पर बैठकर खाना खा रहा था तो आप इस पर यकीन करेंगे? यकीन न करने वाली यह बात देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड में घटित एक घटना है. 26 अप्रैल को एक युवा को केवल इसलिये पीटा जाता है कि वह कथित निचली जाति से है और कथित उच्च जाति के सामने कुर्सी पर बैठकर खाना खा रहा है.

कल से अब तक उत्तराखंड में घटित इस घृणित हत्या की कई खबरें आप पढ़ चुके हैं. कैसे किसी को इतनी हिम्मत आ जाती है कि अपने जातीय दंभ के चलते किसी की हत्या कर दे. कैसे किसी को एक व्यक्ति का कुर्सी पर खाना इतना नागवार लगता है कि वह उसकी हत्या कर देता है. पहले आप देखिये 26 अप्रैल को घटी इस घटना ने लेकर युवक के मृत्यु तक उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने अपनी फेसबुक वाल पर क्या-क्या शेयर किया है.

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के हृदय में करुणा का सागर बहता है. वह उड़ीसा में आये फानी तूफ़ान से विचलित हैं. 13 घंटे पहले वह फ़ानी से प्रभावित लोगों के लिये 5 करोड़ सहायता राशि की घोषणा करते हैं. उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बीते 22 घंटे पहले भारत के शक्तिशाली होने पर एक ओजस्वी भाषण देते नजर आ रहे हैं और बता रहे हैं कि भारत की शक्ति का डंका विश्व में बज रहा है. जिस दिन उत्तराखंड में एक युवा की हत्या होती है उस दिन उत्तराखंड के मुख्यमंत्री दिल्ली हरियाणा में चुनावी सभा संबोधित करते हैं. यहां तक कि इस बीच मुख्यमंत्री किसी ज्योतिष सभा की तस्वीरें भी शेयर करते हैं.

लेकिन कहीं भी एक युवा की नृशंस हत्या पर न तो अफ़सोस जाहिर है न कहीं कारवाई का आश्वासन. जानते हैं क्यों? क्योंकि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के लिये यह कोई बड़ी घटना नहीं है. उनके लिये यह एक आम बात है जो आये दिन उत्तराखंड में घटती सकती है.

यह एक आम बात हो भी क्यों न. उत्तराखंड में जातीय दंभ लोगों के खून में दौड़ता है. बड़े-बड़े लोग जो खुद को दिल्ली और मुम्बई के आयोजनों में इंटलेक्चुअल कहलाना पसंद करते है वह देवभूमि आते ही कथित नीचले वर्ग के साथ एक पंक्ति में भोजन करना पसंद नहीं करते उनके साथ एक धारे का पानी पीना उनके समाज में उनका स्थान डगमगा देता है. एक पंक्ति में भोजन तो दूर की बात है आज भी उत्तराखंड के 90% गावों में कथित निम्न वर्ग को किसी भी समारोह में अलग से अनाज देने की परम्परा है.

आप हल्द्वानी, देहरादून, हरिद्वार जैसे शहरों में जाइये. यहां जमीन लेने वाला जमीन बेचने से केवल इसलिए मना कर देता है क्योंकि उसके अनुसार आप कथित निम्न वर्ग के हैं. टैंकर में पानी लाने वाले से पहले उसकी जाति पूछी जाती है. अगर आप कथित निम्न जाति से हैं तो किराये पर कमरा आपको केवल शर्तों पर ही मिलता है.

आये दिन हम ऐसे रीतिरिवाज का पालन कर रहे हैं जो इस जातीय दंभ को और अधिक मजबूत करते रहते हैं. शादियों में ढोली ओजी का पीटना क्या इस समाज के लिये नयी बात है? जातिसूचक गालियां हमारी भाषा का अभिन्न हिस्सा हैं. लगभग सभी सवर्ण परिवारों में एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिये जातिसूचक गालियों का प्रयोग किया जाता है. ऐसे समाज में एक अनुसूचित जाति के व्यक्ति की हत्या कोई बड़ी बात नहीं है.

जन्म से हमें जातीय दंभ अलग-अलग तरीके से सिखाया जाता है किसके पैर छूने हैं किसके नहीं किसका झूठा गिलास उठाना है किसका नहीं, किसके घर में खाना है किसके नहीं बचपन से ही तो सीखते सिखाते आ रहे हैं हम. हम जातीय दंभ से इस कदर जकड़े हुए हैं कि इस युवा के लिये न्याय तो छोड़िये उसकी आत्मा की शांति के लिये हमसे एक मोमबत्ती नहीं चलेगी.

यहां कि सरकार, यहां के लोग किसी के लिये भी यह हत्या कोई बड़ी बात नहीं हैं. यह एक आम बात है और इसी का नतीजा है कि एक व्यक्ति की हत्या हो जाती है और पुलिस दस दिन बाद भी सात नामजद लोगों में किसी एक को गिरफ्तार करने की हिम्मत नहीं करती.

– गिरीश लोहनी

कौन कहता है उत्तराखंड में विकास नहीं हो रहा

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Girish Lohani

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