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ख़ाकी मर्ज, फ़र्ज़ और कर्ज़ की खिचड़ी है

युधिष्ठिर सरोवर में लोटा डुबाने ही वाले थे कि बगुला रूपी यक्ष प्रकट हुए और अपनी चिर-परिचित प्रश्नोत्तरी प्रस्तुत की. 

यक्ष- हे युधिष्ठिर ख़ाकी वर्दी क्या है? 

युधिष्ठिर- कुत्ता भगाने वाली लकड़ी है! 

यक्ष- प्लीज़ एक्सप्लेन 

युधिष्ठिर-  अपने जन्म के समय से ही पुलिस का इस्तेमाल (इनवर्टेड क्वामा में सुनें) उस छड़ी की तरह किया जा रहा है जिससे अहाते में घुसने वाले कुत्ते को भगाने का काम लिया जाता है. कुत्ता भगाओ और ज़रुरत खत्म हो जाए तो दरवाज़े के पीछे टिकाकर रख दो. तेल-पानी देने की भी ज़रूरत नहीं है. न सिरहाना न पैताना. जहां से चाहे पकड़ लिया जैसे चाहे चला दिया. टूट गई, फट गई उठा के फेंक दिया. ऐसा प्रतीत होता है कि इसकी उतपत्ति ही इसलिए हुई है. अंग्रेजों ने जनता को दबाने के लिए मॉडर्न पुलिस को बनाया था. जनता हमेशा से इसी नज़र से देखती है इसे. पुलिस का खुद का नज़रिया भी यही है शायद. मालिक को खुश रखने के लिए चट् से बजती है.  

यक्ष- ये तो एक ठस्स टाइप परिभाषा हुई. ज़रा बदलते परिवेश में ख़ाकी वर्दी को डिफाइन करो वत्स. 

युधिष्ठिर- पुरानी बोतल में पोखर का पानी. 

यक्ष- ?? 

युधिष्ठिर- हर इंस्टिट्यूशन अपने बनने के वक्त स्ट्रक्चर में कैसा भी रहा हो समय के साथ जैसे-जैसे उसके फंक्शन बदलते हैं तो उसके फॉर्म में बदलाव आना स्वाभाविक है. या इसका उलटा भी. पुलिस के साथ ऐसा नहीं हुआ. वो आज भी उसी कोलोनियल स्ट्रक्चर के साथ है उसी फॉरमैट में है जो इसके जन्म के समय था. तब पुलिस शासक का औजार थी. अब तो असल शासक जनता है (कहा तो यही जाता है) लेकिन औजार अभी भी वही जंग खाया हुआ. मजे की बात ये है कि कोई नहीं चाहता कि इसमें अपेक्षित बदलाव हों. जनता भी कितना दिखावा कर ले उसी कोलोनियल माइंडसेट में है. 

पानी सड़ रहा है, बोतल पिचक गई है लेकिन प्यास बढ़ती जा रही समाज की. यहां तक कि जनता उसी पोखर के पानी से कोल्ड ड्रिंक का मज़ा मांगने लगी है. जनता की अपेक्षाएं लगातार बदल रही हैं, बढ़ रही हैं. इन्ही का परिणाम है कि पुलिस कम्युनिटी लाइजनिंग ग्रुप बना रही है, गुलाब दिवस मना रही है, गाँव गोद ले रही है. कुल मिलाकर वो सब कुछ करना चाह रही है जो इसके अनुषंगी काम हो सकते हैं मुख्य नहीं. न अपराध नियंत्रण में होता है, न क़ानून व्यवस्था सँभलने में है. मतलब प्यास ज्यों कि त्यों है. 

 निभाएं कैसे तुमसे जान-ए-वफ़ा 
दफ़ा होती नहीं दवा कई दफ़ा

यक्ष- अहा! तुम तो शायर भी हो गए लेकिन वत्स… तुम्हारी बात का लब्बोलुबाब क्या है? 

युधिष्ठिर- ख़ाकी मर्ज, फ़र्ज़ और कर्ज़ की खिचड़ी है. 

यक्ष- आजकल तुम ट्रिपल मीनिंग होते जा रहे हो… 

युधिष्ठिर- मेरे कहने का मतलब है कि पुलिस का फर्ज़ है अपराध नियंत्रण और क़ानून व्यवस्था को बनाए रखना  लेकिन नाउ अ डेज़ जिस तरह से हर काम में पुलिस का दख़ल रिक्वायर्ड है इस फर्ज़ का कर्ज़ चुकता होता नहीं और पेंडेंसी बढ़ने से पुलिस को कब्जियत का मर्ज़ हो जाना स्वाभाविक है.

अपराधी डाल से पात पात पात हुआ और फुनगी से होते हुए दूसरे पेड़ पर भी छलांग लगा गया और पुलिस अभी स्टार्ट अप के लिए जड़ों के पास खुर रगड़ रही है. 

पहले इसे गैर ज़िम्मेदार कहते थे. क्योंकि हरकतें ही ऐसी थीं. हनक के लिए थर्ड डिग्री से लेकर क्या-क्या. लेकिन अब! गैरजिम्मेदाराना रवैय्ये से अजब-गज़ब ज़िम्मेदारियों की तरफ लगातार बढ़ रही है. ये वो साबित करना चाह रही है जो ये कभी नहीं कर पाएगी अगर समाज की सोच इसके प्रति नहीं बदलती. और इसके पहले समाज की सोच अपने प्रति नहीं बदलती. अगर अपने साथ कुछ गलत हुआ तो चाहेंगे अगले को नोचकर रख दे पुलिस. न करे तो लचर है. अगर हमसे कुछ गलत हुआ तो तो ज़रा हल्का हाथ रक्खे. दिन रात पूछताछ कर रही है, गालियां दे रही है, परेशान कर के रख दिया… साले होते ही ऐसे हैं पुलिसवाले.

यक्ष- वत्स! बार-बार समाज को क्यों ला रहे हो तुम? हम तो पुलिस के बारे में पूछ रहे हैं. 

युधिष्ठिर- पुलिस क्या वाटर ऑफ़ इण्डिया है जो हवा में निकल जाएगी. इट्स पार्ट एंड पार्सल ऑफ़ दिस सोसाइटी. जैसा समाज वैसी पुलिस. 

यक्ष- ओके राजन! मतलब अगर पुलिस का चेहरा बदलना है तो पहले समाज का मेक अप बदलो. 

युधिष्ठिर- जी. लेकिन पार्लर भेजने से पहले आई स्पेशलिस्ट के पास भेजा जाए समाज को. नज़रिये का बदलाव हो. इसके पास दो ही नज़रिये हैं पुलिस को देखने के. एक मायोपिया वाला दूसरा हाइपर मट्रोपिया वाला. घृणा का या दया का. समाज के अग्रजों ने हमेशा से ही ये दो रास्ते सुझाए हैं पुलिस से घृणा करो या अगर कोई दूसरा पक्ष दिखाना हो तो गलदश्रु स्यापा टाइप रूदाली हो जाओ. कोई बीच का रास्ता नहीं. कोई संतुलित नज़र नहीं. 

पुलिसवाले की नज़र भी स्क्विन्ट है. वो भी यही सोचते हैं कि पीटना है या पिटना है. सिक्स बाई सिक्स वाली नज़र कैसे बने ये एक बड़ा प्रश्न है जिसका जवाब पुलिस को नहीं समाज को देना है.

यक्ष- हाउ इंट्रेस्टिंग ! अब तुम सरोवर का पानी ले सकते हो लेकिन उससे कोल्ड ड्रिंक का मज़ा मत लेने लगना. 

# मैंने सुना है यक्ष ने इस प्रश्नोत्तरी के बाद नज़र-नज़रिया-नज़रिस्तान बदलने तक टेन्टेटिवली अपने श्राप की लिस्ट एडिट करते हुए ‘पुलिस भव’ नामक एक श्राप और जोड़ लिया है.

डिस्क्लेमर- ये लेखक के निजी विचार हैं.

अमित श्रीवास्तवउत्तराखण्ड के पुलिस महकमे में काम करने वाले वाले अमित श्रीवास्तव फिलहाल हल्द्वानी में पुलिस अधीक्षक के पद पर तैनात हैं.  6 जुलाई 1978 को जौनपुर में जन्मे अमित के गद्य की शैली की रवानगी बेहद आधुनिक और प्रयोगधर्मी है. उनकी दो किताबें प्रकाशित हैं – बाहर मैं … मैं अन्दर (कविता) और पहला दखल (संस्मरण) 

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Girish Lohani

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