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छिपलाकेदार: फूलों की घाटी और ब्रह्म कमल के मैदान

नेपाल व तिब्बत से सटे सीमान्त जनपद पिथौरागढ़ की मुनस्यारी व धारचूला तहसील के बीच स्थित है छिपलाकेदार. हिमाच्छादित चोटियों को पृष्ठभूमि में लिए 14 हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित यह नैसर्गिक बुग्याल अपने आप में पर्यटन की असीम संभावनाएं समेटे हुए है. इसके एक तरु मनोहरी फूलों की घाटी है तथा दूसरी ओर राजकीय पुष्प ब्रह्मकमल के विशाल मैदान. छिपलाकेदार स्थित मनोहारी सरोवरों का वर्णन स्कन्दपुराण से लेकर एटकिंसन के हिमालयन गजेटियर तक में दर्ज है.

छिपला तक पहुंचने के‍ लिए पर्वतारोही क्लब आइस का खोजा गया मार्ग महत्वपूर्ण व सुगम है. यह मार्ग जनपद मुख्यालय से जौलजीवी, धारचूला,तवाघाट, खेला, गारापानी होते हुए जाता है. तवाघाट से एक मार्ग धौला नदी के दाएं से दारमा घाटी होता हुआ छिपला पहुंचता है जबकि दूसरा मार्ग उत्तर दिशा में पीछे की ओर होते हुए खेला और गारापानी की ओर बढ़ता हुआ छिपलाकेदार पहुंचता है, जो काली व गोरी नदियों का ह्रदय क्षेत्र व छिपला देवता का निवास स्थल माना जाता है.

10 हजार फुट की उंचाई पर स्थित गारापानी से आगे बढ़ने पर दो खूबसूरत झील सिन्स्या व मिन्सया  नजर आती है. यहां से तीन किलोमीटर आगे वृक्षों की हरीतिमा के बीच स्वच्छ जल का एक अंडाकार सरोवर मोताड़ झिलमिला उठता है. इस सरोवर में जनजातीय लोग सामूहिक पूजा करते हैं जिसे जात कहा जाता है. 1978 में यहां तीन धामियों की डूबकर मौत हो गयी थी. तब से इसमें कोई स्नान नहीं करता. दो किलोमीटर आगे फिर दम्पत्या सरोवर आता है. मंगधील से आगे ब्रह्मकुंड है. इसके आगे बुग्यालों में सालम पंजा, कुटकी, मीठा, कीडा-जड़ी, डोलू, टाटरी जैसी विभिन्न जड़ी-बूटियां यहां मौजूद हैं. इन्हीं बुग्यालों से शुरू होता है आकर्षक ब्रह्मकमल का मैदान.

खम्पाधार जिसे जारचौर भी कहते हैं एक महत्वपूर्ण पूजा स्थल है. जहां पूजा अर्चना कर ब्रह्मकमल अर्पित किया जाता है. यहां से आगे का मार्ग अपेक्षाकृत कठिन है. इस तीखीधार से धीरे-धीरे नीचे उतरने के बाद सामने के टीले पर चढ़ते ही पर्यटक अपने को झीलों से घिरा पाते हैं.

प्रकृति की यह कारीगरी अनूठी है. आगे सुंदरी नामक स्थान है. यहां बड़े-बड़े त्रिशूल व घंटियां लगी हैं. इसके बायीं ओर सैकड़ों फुट गहरी घाटी में बड़े-बड़े बोल्डर हैं जिन्हें ऊपर से देख लोग भयभीत हो जाते हैं. यहां नाले के साथ साथ एक सुंदर सरोवर है जिसे छिपलाकेदार कुंड कहते हैं. सरोवर का जल इतना पारदर्शी है कि इसका तल भी साफ नजर आता है. बड़े-बड़े पटाल ऐसे बिछे हैं मानो किसी कारीगर ने नाप जोड़कर इन्हें सरोवर के तल में बिछाया है. यही है प्रकृति की अद्भुत कारीगरी.

(आइस संस्था के संस्थापक वासु पांडे से बातचीत पर आधारित)

वरिष्ठ पत्रकार ध्रुव रौतेला कई मीडिया संस्थानों से जुड़े रहे हैं.

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Sudhir Kumar

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