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चम्पावत बालेश्वर मंदिर का अनूठा शिल्प

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अलंकृत स्तम्भ युक्त हैं बालेश्वर, सहस्त्र शिव लिंगों से आवेष्टिथ स्वरूप में उनका दर्शन होता है तो नागपाश युक्त कालियावर्धन  का भी स्वरूप है उनका.
(Champawat Baleshwar Temple Sculpture)

लोक विश्ववास है कि परंपरागत रूप से बालेश्वर मंदिर में भगवान शिव की पूजा अर्चना नृत्य के उपरांत की जाती थी जिसका प्रमाण मंदिर से संलग्न नृत्य शाला है. नृत्यशाला की दीवारों पर राग-विहाग में गन्धर्व हैं तो विभिन्न मुद्राओं में नर्तकियां. इन्हीं दीवारों में पत्थरों में उकेरे भिन्न-भिन्न वादयों को लिए वादक तो इनके नीचे नर्तक और फिर हंसों की आपस में संलग्न पंक्ति श्रृंखला.

मंदिर की वाह्य दीवारों में ब्रह्मा, विष्णु व महेश के साथ अनेक देवी -देवताओं का अंकन किया गया है.

मंदिर की चौकी में हाथियों को विभिन्न मुद्राओं में मंदिर के चारों ओर अंकित किया गया है जिसके साथ ही पुष्प सज्जा है.

बालेश्वर मंदिर की दीवारों पर खुजराहो की भांति शिल्प है जो अल्मोड़ा में नंदादेवी में भी दर्शनीय है. चन्दवंश के राजाओं की अल्मोड़ा से पहले राजधानी चम्पावत रही. तभी चौदहवीं शताब्दी में बालेश्वर मंदिर समूह स्थापित हुआ जिसका शिल्प कुमाऊँ के अन्य मंदिरों से थोड़ा भिन्न है. पूरा मंदिर भव्य नक्काशी युक्त अलंकरण से युक्त है.
(Champawat Baleshwar Temple Sculpture)

बालेश्वर में दो शिव गृह हैं जिसमें मुख्य मंदिर स्फटिक से निर्मित है. दूसरे के सन्दर्भ में कहा जाता है कि यह नीलम से निर्मित था जिसे रोहिल्ला आक्रान्ताओं द्वारा नष्ट कर दिया गया. मंदिर में मूर्तियों के अतिरिक्त सिंह, नाग एवम पक्षियों का अंकन बहुतायत से किया गया है. मुख्य कक्ष में गोल पत्थर पर फन उठाए नाग के दर्शन होते हैं. इसके दाऐं पक्षी व सिंह है जिनका मुख मंदिर की ओर है. मंदिर के बाहर की ओर अष्ट धातु का घंटा लगा है जिसमें कर्ण भोज चंद चंदेल का नाम खुदा है.

बालेश्वर मंदिर में प्रातः व सायं मंदिर में पूजा अर्चना विधि पूर्वक संपन्न की जाती है. शिवरात्रि व जन्माष्टमी के अवसर पर मेला लगता है. बालेश्वर मुख्य मंदिर समूह में बालेश्वर के साथ चम्पावती देवी, बटुक भैरव व कालिका के छोटे मंदिर विद्यमान हैं.
(Champawat Baleshwar Temple Sculpture)

इनमें चम्पावती देवी मंदिर के प्रवेश द्वार, पार्श्व की दीवारों व छत में बारीकी से नक्काशी की गयी है. बटुक भैरव मंदिर भी सज्जायुक्त है जिसके प्रवेश द्वार अलंकरण युक्त हैँ. कालिका मंदिर में काली के नीचे शिव के लेटे होने की मूर्ति विद्यमान है.

बालेश्वर मंदिर के बाहर पुराना नौला है जिसमें छतरी लगी है इसके साथ ही चारदीवारी, चबूतरा व फर्श पुरातत्व विभाग द्वारा बनाया गया. प्रांगण में ही अनेक मूर्तियां व कलाकृतियाँ यत्र-तत्र रखी दिखाई देतीं हैं.
(Champawat Baleshwar Temple Sculpture)

जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.

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