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रामगढ़ और धारी के युवाओं की पानी बचाने की मुहिम

पानी की हर बूंद को बचाने की मुहिम
पंकज सिंह बिष्ट

आज कहीं जब चुनाव हो रहे होते हैं तो, चर्चाओं का बाजार गर्म हो जाता है. किसी ने दूसरे मजहब पर कटाक्ष कर दिया तो बवाल हो जाता है. यहाँ तक कि लोग एक दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं. लेकिन आज एक ऐसी चिन्ता का विषय भी है, जो मानव सभ्यता के लिए ही नहीं उन सभी जीवों, वनस्पतियों और जिन्हें जिन्दा होने की श्रेणी में रखा जाता है, के लिए एक भयानक सपने जैसा है. जिसके बिना जीवन की कल्पना करना सम्भव नहीं है.

जी हाँ! यहाँ हम पानी की बात कर रहे हैं. पानी के बिना आप कितने दिन खुद का बजूद बनाये रख सकते हैं? जरा कल्पना करके देखिए. कल्पना मात्र से ही गला सूखने लगता है. वैसे तो यह समस्या पूरे देश और दुनियाँ की है, जो वर्तमान में और भी गंभीर और डरावनी होती जा रही है.

उत्तराखंड जैसे राज्य में जहाँ से कई बड़ी-छोटी नदियां निकलती है. जिन्हें कई सहायक नदियाँ और हजारों-हजार छोटी-छोटी जल धारायें पोसती हैं. भारत के उत्तरी भाग में स्थित ऐसे राज्य में जल संकट अपनी चरम सीमा पर है. कुल 53483 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले इस राज्य का 43035 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर्वतीय क्षेत्र है. जो कुल क्षेत्रफल का लगभग 80 प्रतिशत है. एक आंकड़े के आधार पर इस राज्य के लगभग 64 प्रतिशत भूभाग पर जंगल हैं, जिनका क्षेत्रफल लगभग 34650 वर्ग किलोमीटर है. ऐसे में यहाँ पानी की समस्या पैदा होना एक गंभीर समस्या है.

पहाड़ी क्षेत्र में लोग स्वयं और अपने मवेशियों हेतु पेयजल प्राप्त करने के लिए नौलों, धारों, गधेरों और छोटी नदियों पर निर्भर हैं. जिन्हें भूमिगत जल धाराओं से पानी मिलता है. लेकिन आज इन सभी का अस्तित्व खतरे में है. जिसके कारण आज पेयजल का गंभीर संकट पैदा हो गया है.

स्रोतों में कम हुवा पानी. फोटो: पंकज सिंह बिष्ट

इस समस्या को गहराई से समझने के लिए हमें कुछ वर्ष पूर्व के समय की स्थिति को समझना होगा. 9 नवम्बर 2000 को उत्तरांचल नाम से गठित यह राज्य पूर्व में उत्तरप्रदेश का हिस्सा था. अधिकतर क्षेत्र में कृषि कार्य किया जाता था. पहाड़ी राज्य की अवधारणा से जन्में इस राज्य के गठन के बाद यहाँ तेजी से परिवर्तन आये. अनियंत्रित और अनियोजित विकास ने यहाँ के पर्यावरण को बुरी तरह प्रभावित किया. यहाँ की नदियों को बांध कर बड़े-बड़े बाँधों का निर्माण करने के प्रयास तो 80 के दशक से ही प्रारंभ हो गये थे. अलग राज्य बनने के बाद उनमें और तेजी आ गयी. बेतहासा सड़कों के निर्माण के दौरान गरजती भारी मशीनों और पहाड़ों को तोड़ने के लिये प्रयुक्त डायनामाईट के धमाकों ने भूमिगत जलधाराओं की दिशा और वेग को भारी नुकसान पहुँचाया.

जंगलों से लकड़ी और अन्य वन्य संपदा जैसे लीसा (एक प्रकार का रेजिन या गोद) के दोहन की गति तेज हो गयी. जिसके कारण जंगलों में इंसानी दखल बड़ा, जिसके परिणाम स्वरूप जंगलों में आग लगने की घटनायें कई गुना बढ़ने लगी. जंगली जानवरों का आवादी क्षेत्रों की तरफ दखल बढ़ गया. जिससे किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है.

पर्यावरणीय बदलाव के कारण वर्षाचक्र गड़बड़ा गया, जिसके कारण भूमिगत जल स्रोत रिचार्ज नहीं हो पा रहे हैं. आज हालात यह हैं कि ऐसी नदियां, गाड़ और गधेरे जिन्हें भूमिगत प्राकृतिक जल धाराओं से पानी मिलता था. जिनके पानी से कुछ वर्ष पूर्व तक बारों मास घराट (पनचक्की) चलती थी, आज सूखने की कगार पर हैं.

इसका दूसरा प्रमुख कारण यहाँ के जलागम क्षेत्रों के आसपास की कृषि भूमि का स्थानीय निवासियों द्वारा बिल्डरों और रईस लोगों को बेचना है. जहाँ पर उनके द्वारा बड़ी-बड़ी कॉन्क्रीट की बिल्डिंग और कोठियाँ बनाई जा रही है. उनके द्वारा या तो स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों और जल स्रोतों में कब्जा कर लिया गया है या फिर उन्हें नुकसान पहुँचाया गया है. जिसके कारण समस्या और भी गंभीर हो गयी है. ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल के लिए बिछाई गई सरकारी पाइपलाइन या तो सूखी पड़ी हैं या उनमें हफ़्तों या महीनों में पानी आता है.

कलसा नदी. फोटो : पंकज सिंह बिष्ट

नैनीताल जनपद के धारी विकास खण्ड मुख्यालय से महज 3 किलोमीटर दूरी पर रहने वाले युवा गणेश बिष्ट का कहना था कि “मेरे घर के सामने ही कुछ दूरी पर कलसा नदी बहती है जिसमें आज से लगभग 10 वर्ष पूर्व तक पर्याप्त पानी रहता था. लेकिन कुछ समय से यह कम होता गया और आज स्थिति यह है कि आसपास के सैकड़ों गाँव के लोगों की यह लाइफ लाइन सूखने के कगार पर है.” गणेश आगे कहते हैं कि “चाहे कोई कुछ भी माने, आज के युग में पानी सबसे बड़ी चिंता का विषय है. ‘पहाड़ का पानी’ और ‘पहाड़ की जवानी’ पहाड़ के काम नहीं आ पाते हैं. अगर यह कहावत ही बदलती नजर आए तो विकास के इस दौर में बड़ा ही क्रांतिकारी कदम कहा जा सकेगा.”

वहीं अल्मोड़ा जनपद के लमगड़ा विकास खण्ड के देवली गाँव के निवासी हेमंत कार्की कहते हैं कि “मैं व्यवसाय के चलते हल्द्वानी शहर में रहता हूँ, पिछले दिनों गाँव जाना हुआ तो पानी की हालत देखकर दंग रह गया. चारों तरफ जंगलों में आग लगी हुई थी, गाँव के पानी के स्रोत सूखने की कगार पर हैं. गाँव की महिलाएँ घण्टों धारों (पानी के स्रोत जो एक धारा की तरह पाईप के माद्यम से बहते हैं) पर प्रतीक्षा कर पीने का पानी लाने को मजबूर हैं. ऐसे मैं घर के और काम, बच्चों की देखभाल कैसे करती होगी आप अंदाजा लगा सकते हैं.”

पाटा में खुद से पानी का टेंक बनाते व उसकी लिपाई करते लोग. फोटो : पंकज सिंह बिष्ट

इसी समस्या को देखते हुये नैनीताल जनपद के रामगढ़ और धारी के कुछ युवाओं ने जल संरक्षण को लेकर एक अनोखी मुहिम भी छेड़ी है. जो ऐसे गंभीर समय पर आशा की किरण के समान है. इन युवाओं ने जनमैत्री नाम का सामाजिक संगठन बना कर जल संरक्षण की अलख को जगाने का काम किया है, जिसमें सामुदायिक सहभागिता से रामगढ़ के गल्ला और पाटा गाँव में लोगों को जल संरक्षण के प्रति जागरूक करने के बाद 90 परिवारों द्वारा स्वयं की मेहनत से जमीन में गढ्डे खोद कर, उनकी लिपाई के बाद पॉलिथीन की सहायता से वर्ष जल और उपलब्ध भूमिगत जल को संरक्षित करने का कार्य किया है. इन परिवारों ने लगभग 1500000 (पन्द्रह लाख लीटर) लीटर पानी को संरक्षित किया, जिसका उपयोग पशुओं के पेयजल, कृषि और बागवानी कार्य में किया जा रहा है. जिससे इन गाँवों में अन्य गाँवों की अपेक्षा जल संकट का प्रभाव कम हुआ साथ ही मटर की फसल के उत्पाद में 30 से 40 प्रतिशत की बढ़ोतरी भी हुई.

लोगों द्वारा संरक्षित पानी. फोटो : पंकज सिंह बिष्ट

संगठन से जुड़े बची सिंह बिष्ट कहते हैं कि, “इस उपलब्धि के बाद किसानों में गजब का उत्साह है. कुछ विदेशी अनुसंधान कर्ता इसके प्रभावों का अध्ययन भी करने आये हुये हैं. हम इस मुहिम को और विस्तार देने की योजना पर काम कर रहे हैं. हम चाहते हैं कि लोग पानी की हर बूंद को थामें और उसका उपयोग करें. ”

अब पानी की हर बूंद को बचाने की यह मुहिम पड़ोसी गाँवों में भी समुदाय द्वारा चलायी जाने लगी है. लोग स्वयं से पानी बचाने की योजना बनाते हैं. इसके लिए वह साथ में बैठते हैं, और खुद ही काम करते हैं.

गल्ला गांव में पानी संरक्षण के बाद सिचाई करता किसान.
फोटो : पंकज सिंह बिष्ट

जनमैत्री संगठन से जुड़े प्रगतिशील पर्वतीय कृषक एवं बागवानी प्रशिक्षक महेश गलिया कहते हैं कि, “जल संरक्षण की मुहिम का परिणाम यह हुआ है कि, क्षेत्र के अन्य गाँवों की अपेक्षा जिन गाँवों में जल संरक्षण किया गया था वहाँ फलदार पौधों में फल भी अच्छे साइज और मात्रा में हैं. क्योंकि उस संरक्षित जल से किसानों ने अपने बगीचों में फल के पेड़ों के नीचे लगी मटर की फसल में सिंचाई की थी. जिसकी नमी का लाभ फलदार पेड़ों को भी मिला.”

अब अगर संगठित होकर जल संरक्षण एक मुहिम बन उठे तो बात ही कुछ और बन पड़ेगी. आँखिर हमारा समूचा समाज ‘जल संरक्षण और प्रबंधन’ जैसे ज्वलन्त मुद्दे पर मौन क्यों है? क्या यह चंद लोगों की समस्या है? नहीं यह हम सभी की जिम्मेदारी होनी चाहिए.

सरकारी ख़जाने से प्रत्येक वर्ष विकास के नाम पर एक बड़ी धनराशि व्यय होती है. किन्तु बहुत बड़ा दुर्भाग्य है कि हमारे समाज की निष्क्रियता, आमजनों में जागरुकता का अभाव, जनप्रतिनिधियों की अनदेखी और योग्य व्यक्तियों का मौन क्षेत्र के विकास को जन्म से पहले गर्भ में ही कुचल देता है. परिणामस्वरूप सरकार की निष्प्रयोज्य योजनाएं गाँव-गलियारों में स्थापित हो जाती हैं, जिनका किसी भी व्यक्ति को कोई लाभ नहीं मिल सकता.

किसान द्वारा उत्पादित मटर. फोटो : पंकज सिंह बिष्ट

वैसे तो नैनीताल जनपद में सरकार द्वारा वर्ष 2014 से ही जलागम प्रबन्धन विभाग के माध्यम से जल संरक्षण हेतु योजना का संचालन किया जा रहा है. योजना के ठीक से नियोजन के अभाव में सरकार का यह प्रयास प्रभावी न हो सका. स्थानीय निवासी जिसका प्रमुख कारण नियोजन के समय समुदाय को सामिल न करना मानते हैं. वह कहते हैं कि, “परियोजना की डी.पी.आर. गाँवों के कुछ प्रभावसील लोगों के घरों में बैठ कर तैयार की गयी, पी.आर.ए. जैसी सामुदायिक नियोजन की गतिविधियां केवल कागजों में की गयी जो सरकारी विभागों की कार्यप्रणाली में सवाल उठाती है.”

मेरा मानना है कि यदि सरकार जल संरक्षण की दिशा में वास्तव में कुछ करना ही चाहती है, तो सबसे पहला कदम यह हो कि ‘पहाड़ के पानी’ को पहाड़ के लिए काम में लाया जाय. इसके लिए आस-पास के नदी-नालों में लघु बाँधों का निर्माण किया जाना चाहिए, जिससे आस-पास के ग्रामीण किसानों को पर्याप्त मात्रा में जरूरत के वक़्त सिंचाई के लिए पानी उप्लब्ध हो सके, लघु विद्युत परियोजना के तहत जलविद्युत का उत्पादन किया जा सके, बाहर के पर्यटकों को जलक्रीडा (वाटर स्पोर्ट्स) का आनन्द कराया जा सके. आस-पास के निर्जल क्षेत्रों में ग्रामीणों को जलापूर्ति सुनिश्चित की जा सके, जहाँ संभव हो वहाँ पर मत्स्य व्यवसाय को बल दिया जा सके, और साथ ही हमारे परंपरागत पनचक्की (घराट/ घट) को भी पुनर्जीवित किया जा सके. जिससे स्थानीय आजीविका को भी बढ़ाया जा सकता है.

पता नहीं क्यों ऐसी छोटी-छोटी बहुद्देश्यीय परियोजनाओं से होने वाले दूरगामी विकास को हर किसी ने अनदेखा किया है. इन छोटी-छोटी नदियों में बड़े-बड़े बाँध बना कर क्या फ़ायदा, जो लोगों के विकास के नाम पर तो बनाये जाते हैं, किन्तु लोगों की ही आस्थाओं, उनकी जन्मभूमि, उनके खेत-खलिहानों को इतिहास के पन्नों में दफना कर विकसित किये जाते हैं. मैं इसे वास्तव में ‘विकास’ के जन्मोत्सव के लिए ‘विनाश’ को स्नेह निमंत्रण भेजना ही कहूँगा.

पानी बचाने की बात कहें तो हम सब लोग दूसरों को नसीहत देने के लिए तत्पर रहते हैं और इसके लिए अच्छे मंच भी तलाशते रहते हैं. किन्तु सही मायनों में यदि देखा जाए तो आवश्यकता है धरातल में जल को बचाने की पहल करने की. अब सवाल यह है कि बिल्ली के गले में घण्टी कौन बाँधे? क्योंकि यह काम इतना आसान है ही नहीं. हमें अपनी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए नियोजित ढंग से धरातल में काम करने की जरूरत है, हर एक के मन में एक दूरदर्शी विचार और जीवन में सकारात्मक पहल की जरूरत है, मगर पहल कौन करे?

पानी की इस गंभीर समस्या के प्रति यदि समुदाय और सरकारें समय पर नहीं जागी तो वह दिन दूर नहीं जब यहाँ के वाशिन्दों का अस्तित्व खत्म हो जायेगा. इस बात को इस छोटे से पहाड़ी राज्य के जन प्रतिनिधियों ने भी समझ लेना चाहिए कि उनका वजूद भी तभी तक है जब तक यह पहाड़ और यहाँ का जीवन सुरक्षित है.

यह लेख हमें पंकज सिंह बिष्ट ने भेजा है.  नैनीताल जिले के मुक्तेश्वर में रहने वाले पंकज सिंह बिष्ट उत्तराखण्ड में जन सरोकारों से जुड़े मुद्दों पर लेखन करते हैं.

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Girish Lohani

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