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थल का बालेश्वर मन्दिर: जगमोहन रौतेला का फोटो निबंध

बेड़ीनाग (पिथौरागढ़) से थल (पिथौरागढ़) को जाते हुए पूर्वी रामगंगा के पुल को पार करते ही थल का बाजार शुरु हो जाता है. मुख्य बाजार की ओर जाते हुए पुल से लगभग 25-30 मीटर की दूरी पर बाईं ओर रामगंगा के किनारे बालेश्वर महादेव का सदियों पुराना मन्दिर है जो नागर शैली में निर्मित है. यह कुमाऊँ के प्राचीनतम देवालयों में एक है. (Baleshwar Temple of Thal Pithoragarh) इस मन्दिर की स्थापना और इसके महात्म्य के बारे में स्कन्द पुराण के मानस खण्ड में कहा गया है –

"बालीश्वरस्य देवस्य पाश्र्वे तीर्थोत्तमं शुभम 
निमज्य मानवस्तत्र माघस्नानफलं लभेत"

उल्लेखनीय है कि कुछ साल पहले तक थल में रामगंगा नदी के किनारे चैत्र पूर्णमासी और शिवरात्रि को बहुत बड़ा व्यापारिक मेला लगता था. इसमें सीमान्त के भोटिया व्यापारी ऊनी वस्त्र,  नमक,  गंदरैंण,  हींग,  दन,  चुटका आदि सामान बेचने आते थे. (Baleshwar Temple of Thal Pithoragarh)

इसके अलावा अल्मोड़ा,  हल्द्वानी से आने वाले व्यापारी मिश्री,  तांबे,  लोहे के बर्तन,  कपड़े,  गुड़ आदि सामान लेकर मेले में पहुँचते थे. कहा जाता है कि इस मन्दिर का निर्माण 9वीं-10वीं शताब्दी के आसपास हुआ. निर्माण के 5-6 सौ वर्षों के बाद बालेश्वर देवालय जीर्णशीर्ण हो गया. बाद में इसका जीर्णोद्धार सन् 1686 में चंद राजा उद्योत चंद ने करवाया था.

सभी फोटो एवं आलेख: जगमोहन रौतेला

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काफल ट्री के नियमित सहयोगी जगमोहन रौतेला वरिष्ठ पत्रकार हैं और हल्द्वानी में रहते हैं. अपने धारदार लेखन और पैनी सामाजिक-राजनैतिक दृष्टि के लिए जाने जाते हैं.

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