फोटो, साभार: khabarindia.in
सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) की ओर से ‘चारधाम महामार्ग विकास परियोजना’ को दी मंजूरी पर रोक लगा दी. परियोजना 12 हजार करोड़ रुपये की थी. इस परियोजना के तहत ऑल-वेदर संपर्क मार्ग के जरिये यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ को जोड़ा जाना था. इसके तहत उत्तराखंड में 900 किमी तक सड़क बनाई जानी थी या उन्हें चौड़ा किया जाना था. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में 26 सितम्बर को राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) के फैसले पर रोक लगा दी है. जिसके खिलाफ सिटिजन्स ऑफ़ ग्रीन दून एवं अन्य याचिकाकर्ताओं ने एनजीटी में याचिका दायर की थी जिसमें कहा गया था कि इस प्रोजेक्ट में नियमों से न केवल भारी छेड़छाड़ की गयी है बल्कि पर्यावरण संबंधी जरूरी मंजूरी ली गयी है. एनजीटी ने 26 सितंबर के अपने आदेश में प्रोजेक्ट को जारी रखने के साथ ही शिकायतों के निपटारे हेतु विशषज्ञों को शामिल कर एक ओवर साइट कमेटी बनाये जाने को भी कहा था. अब न्यायमूर्ति आरएफ नरीमन और एस. अब्दुल नजीर की पीठ ने केंद्र व उत्तराखंड सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. मामले पर अगली सुनवाई 15 नवंबर को होगी.
पर्यावरण नियमों के तहत यदि सौ किमी से अधिक किसी सड़क का निर्माण किया जाता है तो उसे पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (इनवायरमेंट अससेस्मेंट रिपोर्ट) की मंजूरी प्राप्त करना आवश्यक है. सरकार ने 900 किमी की इस परियोजना को 53 छोटे भागों में बांटा है जिससे की पर्यावरणीय प्रभाव आकलन के नियम से बचा जा सके.
इसके अलावा इस प्रोजेक्ट के तहत पेड़ों का अंधाधुंध कटान हो रहा है जिसके बदले मैदानी भागों में पेड़ लगाये जा रहे हैं. जिन पेड़ों को काटा जा रहा वह पहाड़ में हैं जो पहाड़ में भूमि कटान को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. देवदार समेत तमाम ऐसे जंगलों को काटा जा रहा है जिनकी वृद्धि दर धीमी होती है लेकिन वे पर्यावरण के लिये अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं. यह इस पूरे क्षेत्र में भू-जल स्तर को बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.
इस प्रोजेक्ट के तहत संवेदनशील घाटी में अनावश्यक रूप से कई स्थानों पर तीस–तीस मीटर तक सड़कों की चौड़ाई बढ़ा दी गयी है जबकि नियमों के अनुसार बोल्डर समेत 11 मीटर से अधिक नहीं की जा सकती. इसके लिये पहाड़ी ढलान का कटान 90 डिग्री तक किया गया है जिसके कारण भू-स्खलन की समस्या अधिक तीव्र हो चुकी है. कटान का पूरा मलबा सड़कों के ढलानों पर ही फेंका जा रहा है जिसके कारण आस–पास की बागवानी योग्य भूमि अब बागवानी योग्य नहीं रही. तीव्र ढालों के कारण यह मलबा सीधा गंगा की सहायक नदियों में जा गिरता है.
प्रोजेक्ट से पूर्व स्थानीय लोगों को रोजगार की बात भी कही गयी थी लेकिन प्रोजेक्ट के निर्माण में अधिकाँश स्थानों में बाहर से ही लोग शामिल किये गये. इसके अलावा सरकार लोगों को चारधाम महामार्ग विकास परियोजना पूरी होने पर रोजगार का जो सपना दिखा रही है स्थिति उसके उलट है. टूरिज्म और धार्मिक टूरिज्म में अंतर है. यदि धार्मिक टूरिज्म कम समय में तय किया जाएगा, यात्री कम स्थानों पर रुकेंगे जिसके कारण लोगों का रोजगार भी कम होगा.
उत्तराखंड में सड़कों के चौड़ीकरण की आवश्यकता ही नहीं है बल्कि समस्या मौजूदा सड़कों के रख-रखाव की है. सरकार को चाहिये था कि उन स्थानों को चिन्हित करे जहाँ सड़कें संकरी थी और उसे पर्यावरणीय प्रभाव आकलन के साथ सही तकनीकी के साथ सही किया जाए.
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