कहानी की कहानी-5
आज जब करीब पचपन वर्ष बाद ‘कहानी’ कथा-पत्रिका में देवेन नाम से छपी अपनी इस कहानी ‘अलगाव’ का पुनर्पाठ कर रहा हूं तो याद कर रहा हूं कि आखिर आदमी के अकेलेपन की यह कहानी मेरे मन में चुपचाप किस रास्ते से चली आई होगी? (Algav Story by Deven Mewari)
पहाड़ की उस बाखली में आखिरी मकान था मेरा घर. शुरू में ठुल बाबू (ताऊ), फिर धूरे के चाचा, जो कभी-कभी वहां रहने आते थे, फिर बड़े चाचा, छोटे चाचा और हम. बाखली की बगल से गांव में ऊपर चोटी की ओर कच्ची सड़क जाती थी. सड़क से ऊपर ठुल बाबू के घर के बगल में दाड़िम का पेड़ था. सामने आंगन, आंगन में नारंगी का पेड़. (Algav Story by Deven Mewari)
ठुल बाबू और धूरे के चाचा के घर भीतर सीढ़ियों से जाने का दरवाजा एक ही था लेकिन दोनों घरों में चैड़ी खिड़कियों के छज्जे अलग-अलग थे. अपने छज्जे से झांकते चाचा निचाट दुपहरियों के सन्नाटे में कभी-कभी चिलम का धुवां बाहर उड़ाते दिखाई देते. आंगन में झूल रहे टोकरी के पालने में ठुल ददा की नन्हीं बच्ची सोती-जागती रहती. चादर से ढके पालने में से उसका रोना सुनाई देता- उइयां ऽऽ उइयांऽऽ. वहीं पास में धूप तापती, ऊंघती बूढ़ी ठुलिजा (ताई) बैठी रहती. धूरे के चाचा-चाची निःसंतान थे.
घर के इन दृश्यों को मैं कभी नहीं भूल पाया. जू़लॉजी, बॉटनी और कैमिस्ट्री पढ़ते-पढ़ते भी ये चित्र मन के कैनवस पर उभरते रहते. और, एक दिन ये सभी चित्र मिलकर चाचा-चाची के अकेलेपन की कहानी बन गए- अलगाव.
अलगाव
देवेंद्र मेवाड़ी
आंगन में दाएं कोने पर टंगे टोकरीनुमा पालने में छोटी पुन्नी रोने लगी है-….उइयांऽऽ…उइयांऽऽऽ…
चाचा ने चौंक कर खिड़की के छेद से सिर बाहर निकाल कर सन्नाटे की यह आवाज ध्यान से सुनने की कोशिश की है.
….उइयांऽऽ…उइंयाऽऽऽ…
सामने दो पेड़ हैं आडू के, एक चाची है, एक आंगन और एक नन्हीं पांचेक महीने की पुन्नी!
पूस में ये दो पेड़ आडू के! पात झर चुके हैं जैसे चिड़ियों के पंख नोंचे गए हों. शीत में सोए हुए दो पेड़. ढलती दुपहर की धूप पेड़ों के किनारे चटाई पर बैठी, झुरझुरा गई चाची के कंधों से लिपट रही है. वह ऊंघ रही है. उसका सिर ऊंघ में घुटनों तक जाकर फिर धीरे-धीरे ऊपर उठ रहा है और उसी गति से गिर रहा है. चाची की यह दुपहर ढलते वक्त की ऊंघ, पेड़ों की यह शीत में सोई स्थिति और पालने में नन्हीं पुन्नी की चीख- उइंयाऽऽ…उइंयाऽऽऽ…
चाचा ने चिलम का पुराना पानी चुपचाप दांई खिड़़की से बाहर फैंका है. पुरानी लकड़ी में जज्ब होता हुआ भी वह चप्-चप् बूदों में नीचे गिर रहा है. बुझे हुए कोयले की नई गट्टी बना कर उन्होंने हुक्के में तंबाकू भरी है.
तंबाकू की कस खींची है उन्होंने और चाची अभी तक ऊंघ रही है. सिर के सफेद हो रहे बालों से चाची का सांवला शरीर बूढ़े पय्यां के खिले हुए पेड़-सा नजर आ रहा है….‘वो समय भी ढल गया है अब तो! चाचा के माथे की एक लंबी रेखा और गहरा गई है और पूस में असमय फूला हुआ पय्यां का पेड़ उनकी आंखों के आगे आ गया है. बेवक्त का वसंत !….‘अहा रे भगवान!’ छूट पड़ता है मुख से तंबाकू के धुएं के साथ ही और धुआं पय्यां के पेड़ को मिटा डालता है.
लेकिन, धुएं के पर्दे पर कुछ और बनने लगा है. पीछे की कुछ अस्पष्ट आवाजें-सी उभरने लगी हैं. एक मूरत-सी आ रही है. कौन है यह? किसकी मूरत है? चाचा घूर-घूर कर देखते हैं और पहचान जाते हैं उस गठीली मूरत को. धुएं में वह सम्मुख आकर खड़ी हो गई है दरवाजे से चिपक कर. एक और मूरत जाती है दरवाजे से भीतर. यह कौन है? अपनी ही सूरत देखकर चाचा चौंक उठते हैं. दरवाजे से चिपक गई मूरत का मुख लाल हो गया है, बुरूंसी. लगता है पिघल जाएगी, बुरूंसी रंग चू-चू पड़ेगा अभी. हथेली की कटोरी में उस मूरत की नुकीली चिबुक भर लेते हैं चाचा. तभी वह फिसल जाती है. बगल से नंदौर की सुडौल चिकनी मांछी की तरह. किनारे पर खड़े, छले गए मछुए की तरह खड़े रहते हैं वे कि तभी आंगन में भाभी की खिलखिलाहट! चौंक उठती है उनकी मूरत और धुएं में ही घुल-घुल जाती है.
पहले कश का धुआं धीरे-धीरे हवा में उठ रहा है- घुल रहा है. धुएं के हटते ही खिड़की के छेद से सामने ऊंघ में गिरता-उठता बूढ़ा चेहरा दिखाई देता है चाची का. कमर की कड़ियों में चसक-सी पैठ गई है उनके… ‘हे राम!’ और तभी चाचा दूसरा कस फूंक देते हैं. धुएं की एक और चादर तन गई है और वह मूरत आकर बैठ गई है एक पटखाट की पाटी पर. दरवाजे में भीतर से सांकल चढ़ा कर बढ़ रही है दूसरी मूरत, पटखाट की पाटी की ओर और पहली मूरत लजा-लजा गई है. उसे लगा है जैसे गोद में झुलाती-खेलती कपड़े की वह बचपनी नन्हीं गुड़िया जी उठी है. जीते ही हिलने लगी है. भीतर ही भीतर कुतकुती लगती है उसे, ठीक वैसे ही जैसे उसके पांव के तलवों को कोई कुतकुताए तो. माछी-सा सुडौल शरीर पूरा ही कुतकुताने लगा है-पूरा ही, और तभी दूसरी मूरत उसे बांध लेती है- जोर से, जोरों से. शरीर का हर अंग जैसे हंसने लगा है. सारा शरीर हंसने लगा है.
वह छूटकर खाट के बस एक कोने पर टिक गई है. शरीर की हंसी बंद हो गई है और भीतर ही भीतर कुतकुताहट बढ़ गई है. कपड़े की गुड़िया जैसे पेट में बैठी छटपटा रही है- इयांऽऽ इयांऽऽ! उसकी गोद बेहद हंस रही है.
दूसरी ओर चाचा ने देखा वे खुद लेटे हैं. बायां हाथ पाटी से नीचे झूल रहा है. बड़ी अंगुली में सुरसुराहट-सी होने लगी है, किसी नन्हीं कोमल मुट्ठी में कस-सी गई है वह. बाएं हाथ की सबसे लंबी अंगुली और जमीन पर उग आई है. एक और नन्हीं सूरत गेहूं के अंकुर-सी उगती है. अंकुर को समेट कर खाट में खींच लाने की मुद्रा में वे अपना हाथ खींचते हैं और अपनी छाती से सटा लेते हैं. धीरे-धीरे पाटियों पर लेटी मूरतों की पलकों पर नींद उतरने लगती है और रात सो जाती है. रातें! ऐसी कितनी ही रातें. धुआं सब कुछ स्वयं में घोल-घोल लेता है और स्वयं भी घुल-घुल कर पारदर्शी होने लगता है.
ढल रही पूस की दुपहरी की पीली-पीली धूप चाची को झिझोड़ रही है. रो रही है और वह ऊंघ रही है. हवा के झौंके से एक बार हिल गई बूढ़ी डाल-सी, सफेद बालों भरा सिर, मुड़े हुए घुटनों तक हिल रहा है. स्मृतियां पेड़ों की पतझरी पत्तियों की तरह बिखर गई हैं.
किसी और फूंक के धुएं ने खिड़की का छोटा छेद ढक लिया है और एक सफेद चादर-सी तान दी है. उस चादर पर कितने ही चित्र आकर खिसके जा रहे हैं. हर रात उस चादर में उभरती है. हर एक रात! पटखाट की चुचुआहट अलग से कानों के गिर्द घूमती है. कितनी ही रातें उस सफेद चादर से फिसल गई हैं. फिर आती हैं…फिसलती हैं, कितनी ही.
बेबसी का सुरमई रंग चाचा की आंखों में उतर आया है. मैं जानता हूं यह रंग धुएं का कदापि नहीं है. एक बेबसी का रंग है यह. धुएं की एक-एक फूंक के बीच जितना पारदर्शी समय छूट जाता है, उस बीच उसके पार झट धीरे-धीरे ऊपर-नीचे उठता-गिरता हुआ बूढ़ा चेहरा दिखलाई दे जाता है. एक टीस का पीला-पीला सा रंग, बेबसी के सुरमई रंग में मिल कर अजीब कीचड़ का रंग चाचा की पुतलियों में फैल जाता है. पर शीघ्र ही दूसरी फूंक के सफेद पर्दे पर रातें आ-आ कर सरकने लगती हैं, उन्हीं की आंखों के सम्मुख. ठीक उन्हीं की आंखों के आगे.
अनगिनत रातें सरकने के बाद की रातों के चित्रों में खाट के ऊपर पड़ी निर्जीव-सी मूरतों की आंखों में एक अजीब-सा रंग रेंग रहा है. दिनों के चित्र भी उभरते हैं- उचाट दिनों के. हे परमेश्वर! उन्हें किसी का भान होना अचानक ही आरंभ हो गया है. बेबसी का रंग घुल कर आंखों के सम्मुख कभी एक मूरत गढ़ता है, कभी अनेक. उनमें से सभी के आगे वे टूट-टूट से जा रहे हैं. बिखर-बिखर कर बिछ जा रहे हैं. किसी अमूरत-मूरत के होने का विश्वास उनमें गहराने लग गया है.
‘हाइ ईजा!’ कमर की कड़ियां कसकती हैं चाचा की.
धुएं के पर्दे पर असहाय-सी मादा मूरत करवट पर करवटें बदल रही है- कुकताहट की, बेबसी की. कपड़े की नन्हीं गुड़िया जैसे पेट में ही सूख गई है. दरदरे कपड़े की गुड़िया जैसे भीतर ही भीतर कुछ खरोंचने लगी है. एक शून्य-सा भीतर ही भीतर पनप रहा है. फैल रहा है. शून्य! खाली-खाली सा लगने लगा है उसे सब कुछ और वह सिसक-सिसक कर खाट पर उलट-पुलट रही है.
वे भी निरीह हो गए हैं. स्वयं के ऊपर कोई अपारदर्शी मूरत छत की तरह फैली हुई उन्हें लगने लगी है. कभी भी अकेले में वह निरीह, टूटा हुआ व्यक्ति गिड़गिड़ा कर मिन्नतें कर रहा है. दोनों हाथ जोड़ कर, माथा जमीन से टेक कर उस पारदर्शी मूरत को, जो अब उसके मस्तिष्क में घर कर गई है और शायद कभी भी उसके सिर के ऊपर अपना हाथ फेर देगी.
बेबसी और टीस के सुरमुई और पीले रंग धुएं की सफेदी में घुल जाते हैं. फिर पुंछ जाते हैं और इसी क्रम में धुआं धीरे-धीरे घुल कर पारदर्शी होने लगता है और खिड़की के छेद से दृष्टि बाहर कूद जाती है. बाहर चाची है, बूढ़ी, औलाद हीन तथा ऊंघती हुई.
चाचा ने चिलम वहीं चूल्हे के किनारे से टिका दी है और जम्महाई लेकर बाहर झांका है- खिड़की से सिर सटा कर. आंखों की पोरों में पानी रिस आया है जैसे नदी के सूखे रौखड़ में कोई पतली पानी की धार फूट आई हो. दोनों हाथों की पहली अंगुलियों से दोनों आंखें दबाई हैं और आंखों से नाक की ओर के किनारे किचकिचा उठे हैं.
सामने दो पेड़ है सोए हुए आड़ू के, एक चाचा है, एक आंगन और एक छोटी पांचेक महीने की दाज्यू की लड़की पुन्नी, बिलखती हुई- उइयांऽऽ…उइयांऽऽऽ
पुन्नी की आवाज उन्हें साल रही है. दुपहर ढल रही है. पालने में ठंडा होने लगा होगा. भाभी अभी तक नहीं आई है. शायद पुन्नी भूख से बिलख रही है. चाचा खिड़की से सट कर बैठे हैं. पुन्नी रो रही है और चाची ऊंघ रही है. दोनों की पीठें पालने की ओर हैं. चाचा ने जरूर एक बार अपनी ओर, एक बार ऊंघ रही चाची की ओर देख कर नजरें आड़ू के पात झरे, सोए हुए स्थिर पेड़ों पर गड़ा दी हैं. स्थिर समाधिस्थ पेड़ों पर. उनकी आंखों में दोनों स्थिर, निर्वसन पेड़ों के बिंब हैं; बस.
उन्होंने यूं ही सोचा है कि चैत आते न आते यदि इन दोनों पेड़ों को काट दिया जाए तो? फिर तो, सोए ही रह जाएंगे ठीक हमारी तरह, बिना फूले. उनके होंठों पर बेबसी की हंसी आई है. पुन्नी की आवाज ने उन्हें फिर चौंका दिया है. भीतर अंधेरे में गिलास ढुलकने की आवाज आई है, शायद कोई बिल्ली वगैरह होगी.
खीझ कर चाचा ने उसे- देखती क्यूं नहीं- कहने के स्वर में झटक कर सिर बाहर निकाला है लेकिन चाची से कुछ कहा ही नहीं. फिर खुद ही खड़े हो गए हैं घुटनों पर हथेलियों का भार देकर. कमजोर धागे टूटने की सी आवाजें हुई हैं. चौतरे की सीढ़ियों से उतर कर वे आंगन में आ गए हैं और पालने के ऊपर ओढ़ाई गई चादर किनारे हटा कर पुन्नी को चुमकारा है. चूमा है. और, विवश होकर अपना अंगूठा उसके मुंह में दिया है. वह अंगूठा चूसने लगी है. और चाचा के गिर्द खालीपन उभरने लगा है.
वे चाची की ओर देख रहे हैं और उसके चारों ओर एक शून्य विस्तार पाता जा रहा है जो निरंतर उन्हें उससे अलग-अलग सा कर रहा है. उस खाली स्थान के भीतर वे जा नहीं सकते अब. अभी तक पूर्णतः हर चीज से जुड़े हुए चाचा को अब एक बढ़ते हुए शून्य की सीमा काटती जा रही है और अकेलगी उन्हें धीरे-धीरे घेरने लगी है.
वे सब से कट गए हैं. अलग!
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वरिष्ठ लेखक देवेन्द्र मेवाड़ी के संस्मरण और यात्रा वृत्तान्त आप काफल ट्री पर लगातार पढ़ते रहे हैं. पहाड़ पर बिताए अपने बचपन को उन्होंने अपनी चर्चित किताब ‘मेरी यादों का पहाड़’ में बेहतरीन शैली में पिरोया है. ‘मेरी यादों का पहाड़’ से आगे की कथा उन्होंने विशेष रूप से काफल ट्री के पाठकों के लिए लिखना शुरू किया है.
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