नैनीताल. फोटो: अमित साह
नैनीताल के फांसी गधेरे से जुड़ी अनेक किंवदंतियों-कहावतों-किस्सों के पसमंजर में गूंथकर रचा गया है इस अद्भुत कथा को. इतिहास, समाजशास्त्र और फंतासी के बीच तैरती-उतराती यह कथा एक से अधिक बार पढ़े जाने की दरकार रखती है.
लक्ष्मण सिंह बिष्ट ‘बटरोही’ की यह कहानी ‘कादम्बिनी’ पत्रिका के इस साल के मार्च अंक में प्रकाशित हुई है. उन्होंने इसे काफल ट्री में छापने की अनुमति दी है. दोनों का आभार.
गधेरा नदी नहीं हो सकता
– बटरोही
फाँसी गधेरा नैनीताल के दक्षिण-पश्चिमी छोर पर आज भी स्थित है; हालाँकि है यह एक काल्पनिक नाला ही. काल्पनिक इसलिए कि इस जगह पर किसी भी नैनीतालवासी ने आज तक कोई नाला नहीं देखा, न पानी का, न खून का और न सूखा. अब तो यह शहर के खास लोगों का घना इलाका बन गया है मगर जब हम छोटे थे, इस भुतहा इलाके में हनुमान चालीसा रटते हुए समूह में गुजरते थे.
किसी ने देखा नहीं, सिर्फ सुना था कि सैकड़ों साल पहले हिमालय की ऊंचाई वाली गुफा के अन्दर रहने वाले उभरे माथे और सपाट सिर के बीच हल्की रेखाओं वाली भोंहों और पीले गोल-मटोल चेहरे वाले गुरखों ने उस साल नैनीताल में जबरदस्त उत्पात मचाया था. उनका राजा हमारी प्रजा से जब बुरी तरह घायल हो गया था तो तिब्बत से जुड़े उस गुफानुमा देश के सारे लोग बंदरों-लंगूरों की तरह खांकते-चीखते हुए हमारे पूरे इलाके में छा गए थे. जो भी मिला, उसे इसी गधेरे के शिखर पर लाकर वे अपनी खुकरियों से सिर काटकर नीचे घाटी की ओर छटकाते चले गए. पूरे इलाके में इतना खून बहा कि चारों ओर नरमुंड तैरने लगे. यही खूनी पहाड़ी नाला एक दिन ‘फांसी गधेरा’ के नाम से मशहूर हो गया.
हमारे छुटपन की दूसरी स्मृति गधेरे की जड़ पर स्थित उस भुतहा कोठी की है जिसे शहर से लोग ‘लल्ली की कबर’ कहते थे. संभव है, इस इलाके में बनी वो पहली रिहाइशी इमारत थी, मगर इस बात की कोई साफ जानकारी नहीं मिलती कि इसमें कौन लोग और कब रहते थे और यह खुशहाल बंगला खंडहर कब्र के रूप में कब और कैसे बदल गया!
उस ज़माने के लोग लल्ली की कबर के किस्से खूब उत्साह के साथ सुनाया करते थे, वो किस्से, जिनमें न तो नैंसी दिखाई देती थी, न लल्ली, फिर भी उन दोनों के बेहद रोमांचक किस्से नैनीताल वासियों की जुबान में हर वक़्त मौजूद रहते थे.
और यह लल्ली कौन थी? पुराने बुजुर्गों का तो कहना था कि इस बंगले में किसी ज़माने में नैंसी नामक एक अंग्रेज मैम रहती थी जिसे लोगों ने देखा तो नहीं मगर उसके तमाम किस्से नैनीताल के लोग एक-दूसरे को सुनाया करते थे. लोग इस बात का भी कयास लगाते थे कि नैंसी की कबर ही एक दिन लल्ली की कबर बन गयी होगी. फिर भी यह बात तो आखिर तक रहस्य बनी ही रही की अंग्रेज नैंसी और पहाड़ी लल्ली अलग-अलग नामों वाली एक औरत की दो आत्माएं थीं. अगर वो एक ही औरत के दो अलग-अलग नाम थे तो लोग जिज्ञासा प्रकट करते कि इतनी दूर सात समंदर पार की नैंसी में नैनीताल की लल्ली की आत्मा कैसे घुस आयी होगी… हालाँकि, बुजुर्ग बताते थे कि थी वे एक ही आत्मा के दो रूप!
वर्षों की रोमांचक और उत्तेजक चर्चाओं के द्वारा जो तस्वीर उभरती है, वह किसी औरत के नाम पर नहीं, भुतहा खंडहर पर ठहर जाती थी और सारे किस्से बढ़ते-बढ़ते खंडहर की एक उदास प्रेम कहानी की शक्ल ले लेते जहाँ प्रेम की गहराइयों में खो जाने का अनंत जज्बा; मिलन, विछोह और एक गहराता रहस्य लोगों के कौतूहल का कभी ख़त्म न होने वाला सिलसिला बन जाता था.
कुछ पुराने लोग बाकायदा विश्वास के साथ बताते थे कि वर्षों तक इस खंडहर के बीच से दो सामानांतर आवाजें उभरती रहती थीं, ‘ओ, माय नैनी… माय नैंसी स्वीटहार्ट…’ कि तभी पहाड़ी लोकगीत-शैली न्योली की दर्दभरी पंक्तियाँ उभरतीं, ‘त्यर जुठो मैं नि खाछीं सुवा, माया ले खवायो’!… ‘तेरा जूठा मैं नहीं खाती थी मेरी प्राण, मगर नियति ने खिला दिया!’
चर्च शैली में बनी यह कोठी नैनीताल के तालाब के किनारे एक हल्के-से बुर्ज पर बनी हुई थी. तालाब के किनारे झुकी हुई शाखाओं वाला वीपिंग विलो, मजनूं और चेस्टनट के विशाल वृक्षों की भारी-भरकम शाखाएं हर वक़्त जल की गहराइयों को चूमने की कोशिश में भरपूर डूब जाना चाहती थीं. मगर तब यह इलाका लल्ली की कबर था ही कहाँ, एडवर्ड, नैंसी और लल्ली की अजीबोगरीब दास्ताँ का गवाह था.
फांसी गधेरे के उत्पात के बाद उसकी जड़ पर बना यह नैनीताल का इकलौता बंगला साँझ होते ही गहरे एकांत, हल्के सलेटी कोहरे और धुंधभरे अँधियारे के साथ किसी नई प्रेम-कहानी का वितान फ़ैलाने में जुट जाता. सुबह के स्वर्णाभ झुटपुटे में, स्काटलैंड के अपने पुश्तैनी बगीचे से लाये गए बाटल ब्रश (मजनू) और चमकीली पत्तियों वाले स्प्रूस के पेड़ उनींदी आँखों से चारों ओर देखते थे; सुबह का उजाला मेग्नोलिया के शंखाकार चटख श्वेत पुष्पों की पंखुड़ियों में अटकी पारदर्शी ओस की बूदों के रूप में अपनी ही मोटी पत्तियों के आँचल में लुढ़कती रहतीं. घर की स्टडी के बाहर हायड्रेन्जिया की खूबसूरत गोल झाड़ियाँ और उनकी गोद में स्वप्निल नीले और गुलाबी फूल अलमस्त सोये रहते. पोर्टिको के बाहर दोनों ओर सफ़ेद लिली के फूल मुस्कराते रहते और बोगेनविलिया की झाड़ियों में चटख लाल और जामुनी रंग के फूल आपस में बतियाते दिखाई देते.
हमारी पीढ़ी इस विराट, रहस्यमय कोठी के बारे में लल्ली की कबर के जरिये अनुमान ही लगा सकती थी. कोठी के अवशेष और सुनी-सुनाई बातें आपस में मिलकर इतनी गड्ड-मड्ड हो चुकी थीं कि किसी भी एक निष्कर्ष तक पहुंचना संभव ही नहीं था, इसलिए हमारी जिज्ञासा आगे खिसकती चली गयी किंवदंतियों के सहारे नए-नए रूप लेती चली गई.
***
बहुत छुटपन में हमारी आँखों देखी लल्ली की कबर अब एकदम बदली हुई इमारत थी. पुराने बंगले का जो भव्य वर्णन हमने सुना था, उसके सामने तो नयी इमारत उसके आउट हाउस के बराबर भी नहीं थी, फिर भी इसके पुरानी इमारतों के साथ जुड़ाव की कहानी पर हम अविश्वास इसलिए नहीं कर सकते थे क्योंकि इसे हमने इसी रूप में आबाद देखा था. यह एक दुमंजिली पत्थर-चिनी इमारत थी, जिसका आधार तल पत्थर का और प्रथम तल लकड़ी और मिट्टी का बना था. हमारे देखे, प्रथम तल में एक ठकुराइन रहती थी, आधार तल में पहली मंजिल के बरामदे से लकड़ी की सीढ़ियाँ निचली मंजिल के दरवाजे तक पहुँचती थीं. ठकुराइन ने प्रथम तल के भीतरी कमरे से अन्दर-ही-अन्दर सीढियाँ बनवायीं थीं, जो बरामदे के मुख्य दरवाजे में भीतर की ओर मिलती थी. रात-अधरात किसी को सामान की जरूरत होती तो ठकुराइन खिड़की के रास्ते ग्राहक का नाम पूछकर सामान दे देती थी.
ठकुराइन का घर इस इलाके की इकलौती इमारत थी, मगर किसी को भी इसकी मालकिन का वास्तविक नाम मालूम नहीं था. बहुत बाद में मालूम हुआ कि उसका नाम लल्ली नहीं, ठकुराइन था, जो अधेड़ उम्र की गदराये बदन की औरत थी. उसका वास्तविक नाम जानने की किसी को जरूरत नहीं थी क्योंकि ग्राहक और दुकानदार दोनों ही उसके इस पेशे से जुड़े नाम से काम चला लेते थे.
ठकुराइन ने कब यह घर बनवाया और कब वह एक गृहस्थिन से दुकान की मालकिन बनीं, इसकी जानकारी भी किसी को नहीं है, अलबत्ता हमसे पहले की पीढ़ी के लोग बताते थे, जवानी के दिनों में वह भी लल्ली और नैंसी की तरह सपनीली आँखों वाली बहुत खूबसूरत पहाड़ी लड़की रही होगी. कुछ लोगों का कहना था कि उसका वास्तविक नाम भी उतना ही सुन्दर होगा जितनी कि वह खुद थी.
लल्ली की कबर के साथ इस ठकुराइन का सम्बन्ध कुछ पुराने लोग विमल रॉय की मशहूर फिल्म ‘मधुमती’ के साथ जोड़ते थे. साठ के दशक में जब नैनीताल-भवाली के बीच के जंगल में ‘मधुमती’ की शूटिंग हुई थी, कई दृश्य, खासकर उस भुतहा कोठी के शॉट विमल रॉय ने लल्ली के कबर में ही खींचे थे. लोगों को इस बात पर पूरा विश्वास था कि उन दिनों ठकुराइन की उम्र चौदह-पंद्रह से अधिक की नहीं रही होगी. कुछ तो आज भी विश्वास के साथ बताते हैं कि वैजयंती माला के ‘बिछुआ’ गाने में पीछे की ओर से चौथी लड़की यही ठकुराइन थी, हालाँकि साठ पार कर चुकी ठकुराइन अपनी कमर ऐसे भी लचका लेती होगी, इस पर आज यकीन कर पाना वाकई मुश्किल है.
हो सकता है की वैजयंती माला के पीछे चौथे नंबर पर नाचती हुई वह लड़की ठकुराइन न हो, मगर प्रत्यक्षदर्शियों की इस बात को भी तो नहीं नकारा जा सकता कि लल्ली और ठकुराइन की शक्ल एक-दूसरे के साथ ऐन-मैन मिलती थी. क्या पता, नैंसी के बंगले में प्रेमालाप करते उस स्कॉटिश युवक एडवर्ड के पहाड़ी लल्ली के साथ जो अबैध सम्बन्ध थे, ठकुराइन उन्हीं की संतान हो और जब वह युवक लल्ली को दफनाकर नैंसी के साथ अपने मुल्क लौटा हो तो छोटी-सी बच्ची को बंगले के साथ अपने बावर्ची को सौंप गया हो लेकिन ठाकुर के बेटे ने सारी जायदाद हड़पकर उसे तालाब किनारे एक दुमंजिला मकान बनवाकर शादी का झांसा देकर अलग कर दिया हो कि भैया, इंग्लैंड जाकर उसे क्या पता चलता है कि फांसी गधेरे की उसकी लैला आज नैनीताल में किस हाल में है!
मगर ठकुराइन थी एकदम मस्त, जैसे उसमें सचमुच स्कॉटिश खून का अक्खड़पन और पहाड़ी दूध का भोलापन भरपूर वैभव के साथ सिमट आया हो. इतना ही नहीं, लोग तो कहते हैं, ठकुराइन के व्यवहार और रुपये-पैसे के लेनदेन में गोरखा ईमानदारी भी भरपूर झलकती थी. सभी लोग आज भी पूरे मन से बताते हैं कि ठकुराइन ने फांसी गधेरे की उस इकलौती दुकान पर अपनी जिंदगी के बेहतरीन दिन पूरी मस्ती से गुजारे.
हाल के दिनों में फांसी गधेरे के तिराहे और उस पर दिखाई देने वाली एकमात्र दुकान का नक्शा पूरा बदल चुका है. दुकान का रूपाकार और उसकी मालकिन तो नहीं बदले, अलबत्ता दुकान में बिकने वाला सामान और उसकी सजावट में फर्क आया है. इसका एक बड़ा कारण गधेरे के बीचों-बीच शहर के एकमात्र डिग्री कॉलेज का खुलना है जो, इलाके का भी एकमात्र सरकारी महाविद्यालय होने के कारण जल्दी ही एक बड़े शिक्षा-केंद्र के रूप में स्थापित हो गया.
आसपास कोई चाय-पानी की दुकान न होने के कारण ठकुराइन की दुकान कॉलेज के लड़के-लड़कियों का सुविधाजनक मिलन-केंद्र बन गया. उम्र बुढ़ापे की दहलीज पर आ जाने के बावजूद ठकुराइन ने दुकान पर बैठना नहीं छोड़ा अलबत्ता दो बच्चे, एक लड़का और एक लड़की अपनी मदद के लिए रख लिए. संभव है, घर में परिवार का कोई सदस्य न होने के कारण बुढ़िया ने यह निर्णय लिया हो, फिर भी ग्राहकों की बढ़ती संख्या को देखते हुए यह जरूरी था. कबर का इंतजार करती अकेली जान क्या-क्या जो देखती! कभी-कभी ग्राहकों में से ही कोई टिप्पणी कर देता, ‘क्या पता, कॉलेज जाने वाले युवाओं में ही वह अपने अजन्मे बच्चों का अक्स देखती हो…’ तो भी, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि उसे अकेलेपन का सहारा तो चाहिए था. हर उम्र के बच्चों के साथ आसानी से घुलमिल जाने का एक कारण यह हो ही सकता है.
फांसी गधेरे के मध्य में कॉलेज खुलने के कई बरस बाद की बात है, जब ठकुराइन ने नोटिस किया कि सत्रह-अठारह साल के दो छात्र, जिनमें लड़की कुछ बड़ी और लड़का उम्र में छोटा लगता था, उसकी दुकान के बाहर की बैंच में बैठकर घंटों गंभीर बहस में उलझे रहते थे. लड़का शक्ल और व्यवहार से पहाड़ी लगता था, मगर लड़की तीखे नाक-नक्श में गोरी-चिट्टी होने के बावजूद अपने कद के कारण पहाड़ी कतई नहीं लगती थी. कोई जरूरी नहीं कि वह ब्रिटिश या स्कॉटिश हो. हो भी सकती थी, कॉलेज में देश-विदेश के बच्चे पढने के लिए आते ही थे, मगर बूढ़ी ठकुराइन यह सब क्या जानती? उसके लिए क्या देसी और क्या परदेसी!
***
लड़की ने कहा, ‘तुम ‘गोर्ख्यानी’ के बारे में जानते हो?’, उसने फांसी गधेरे के शिखर की ओर कदम बढ़ाते हुए कहा.’
‘सुना तो है. क्या गोरखे और स्कॉटिश लोगों में समानता होती है?’
‘क्या बात करते हो!, लड़की ने कहा, कहाँ चार फुट के गोरखे और कहाँ छै फुटे स्कॉटिश! कोई तुलना ही नहीं.’
‘अगर गोरखा-स्कॉटिश की क्रॉस ब्रीड पैदा हो तो वह कैसी लगेगी?’
‘कैसी क्या, होगी तो आदमी ही.’ लड़की कॉलेज के रास्ते न जाकर सीधे शेरवुड की चढ़ाई चढ़ने लगी. बांज की एक झुकी मोटी टहनी का सहारा लेकर वो बोली, ‘वो किस्सा सुना है तुमने, बर्नार्ड शॉ से उस दौर की मशहूर अभिनेत्री ने कहा था – हम लोग शादी कर लें तो हमारी कितनी महान संतान होगी! तुम्हारा दिमाग और मेरी ख़ूबसूरती दोनों मिलकर अद्भुत प्रतिभा को जन्म देंगे… मगर बर्नार्ड ने तो उसे चुटकी भर में निराश कर दिया – और अगर इसका उल्टा हो गया तो? मेरा चेहरा और तुम्हारा रूप!’
वे दोनों हंसने लगे, एक फीकी हंसी.
लड़के ने कहा, क्या यह संभव है कि एक पूरी कौम दूसरी कौम की गर्दनों को इतना काट दे कि खून से नाले बहने लगें…’
‘फांसी गधेरा…’ लड़की ने वाक्य पूरा किया.
‘लल्ली की कबर लल्ली की ही होगी? वो नैंसी की क्यों नहीं हो सकती?’
‘नैंसी स्कॉटिश थी और लल्ली पहाड़ी.’
‘इससे क्या फर्क पड़ता है?’
‘ठकुराइन को तो फर्क पड़ा ही था ना! लल्ली की जगह अगर वो नैंसी की बेटी होती तो ठाकुर उसकी जायदाद ऐसे नहीं हड़प जाता.’
फांसी गधेरे के शिखर तक वो लोग अभी नहीं पहुंचे थे. दाहिनी ओर पहाड़ की चोटी पर देवदार के दो विशाल पेड़ सामानांतर रेखाओं की तरह मुस्तैद खड़े थे. लड़की मानो कुछ भावुक हो गयी.
‘औरत को ही झुकना पड़ता है.’ लड़की ने मानो अपनी बात पूरी की, ’देवदार क्यों नहीं झुकता, क्योंकि वह देवताओं का वृक्ष है!’
‘देवी के वृक्ष को लाल कपड़े और पीले धागे से बांधा जाता है. वो पवित्र वृक्ष होता है, पीपल और कदम्ब की तरह.’
‘पीपल संसार को छाया देता है, पापी आत्माओं को अपनी शरण में लेकर उन्हें पाप-मुक्त करता है.’
वे दोनों मानो आत्मालाप कर रहे थे. वह संवाद तो किसी भी रूप में नहीं था.
‘चलो, एक खेल खेलते हैं.’ लड़की उसी उदास स्वर में बोली, ‘मैं बन जाती हूँ नदी और तुम बन जाओ गधेरा. फांसी गधेरे के मुस्तैद जुड़वां देवदारों को साक्ष्य मानकर हम नैनीताल के इस सबसे ऊंचे शिखर पर खड़े अपनी नस्ल बदलने की घोषणा करते हैं.’
लड़के ने कहा, ‘देवदार को आशीर्वाद देने के लिए झुकना पड़ेगा, जो उसके लिए संभव नहीं है. पीपल को झुकने की जरूरत पड़ती ही नहीं, क्योंकि वह पैदा भी घाटी में होता है और जवान भी घाटी में ही. देवदार-सा अक्खडपन किस काम का, जो न शरण देता न जरूरत पड़ने पर छाया.’
लड़की, जो वनस्पति विज्ञान में एमएससी कर रही थी, उसी परिचित उदासी भरे अंदाज़ में बोली, ‘कहते हैं, देवदार का पेड़ सौ साल खड़ा, सौ साल पड़ा और सौ साल सड़ा.’
‘देवताओं के लिए सभी कुछ संभव है! लड़के ने कहा.
फ़ोटो: मृगेश पाण्डे
लक्ष्मण सिह बिष्ट ‘बटरोही‘ हिन्दी के जाने-माने उपन्यासकार-कहानीकार हैं. कुमाऊँ विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष रह चुके बटरोही रामगढ़ स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ के संस्थापक और भूतपूर्व निदेशक हैं. उनकी मुख्य कृतियों में ‘थोकदार किसी की नहीं सुनता’ ‘सड़क का भूगोल, ‘अनाथ मुहल्ले के ठुल दा’ और ‘महर ठाकुरों का गांव’ शामिल हैं. काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.
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Thanks to Kafal Tree team, for their labour and curiosity.