केशव भट्ट

महाकाली नदी के उद्गम पर स्थित मां काली का भव्य मंदिर

गुंजी से निकलते-निकलते आठ बज गए. आगे लंबे मैदान में एक जगह एक शिलापट्ट स्थापित था. ऐसा लग रहा था शायद यह तिब्बती भाषा में लिखा होगा. गुंजी में कुछ नौजवान मिले, जो तिब्बत के तकलाकोट कस्बे में कारोबार करने जाते हैं. सामने से घोड़े में तेजी से एक नौजवान आता दिखाई दिया. हमारे रुकने का इशारा करने पर उसने फुर्ती से आगे जाकर अपने घोड़े को मोड़ा और हमारे बगल में आकर खड़ा हो गया. उसने अपने घोड़े को प्यार से पुचकारा तो घोड़े ने भी हिनहिनाकर अपनी खुशी जाहिर की. घोड़े और मालिक की गहरी दोस्ती देखने लायक थी. उसने बताया कि गुंजी में साल में एक बार घौड़ों की दौड़ होती है और वह अभी उसी का अभ्यास कर रहा है. (Sin La Pass Trek 10)

हमने उससे हाथ मिलाया और उसे घुड़दौड़ में सफल होने दुआएं देते हुए आगे बढ़े. मैं खाली हाथ था और इस कारण इस मिश्रित जंगल के बीच गुजरने का आनंद ही कुछ अलग था. रास्ते में एक जगह आईटीबीपी का एक जवान गश्त को गए अपने सांथियों के इंतजार में चाय-नाश्ता लिए बैठा दिखा. हमने उसे अभिवादन किया तो उसने भी प्रेमवश हमें चाय, नमकीन परोसनी शुरू कर दी. हमारे लाख मना करने पर भी वह माना नहीं. कुछ पल उसके साथ भी गपशप हुई. आगे नाभी जाना है. कहते हुए हम जवान के गले मिले और आगे बढ़ गए.

आगे का रास्ता हल्का उतार-चढ़ाव लिए हुए रास्ता काली नदी के साथ-साथ था. इस समतल जगह में काली का बहाव कल-कल करता है. उसके आकर्षण में हमने भी जूते उतार लिए और काली के पानी ठंडक लेने नदी में उतर गए. बर्फीले पानी में पांव डालते ही जैसे थकान काफूर हो गई. हरी घास में आधे घंटे तक पसर मीठी झपकी ले ही रहे थे कि पंकज ने देरी का वास्ता दे सबको जगा दिया.

कुछ देर बाद रास्ता उंचाई की ओर जाते हुए संकरा हो गया था. नीचे गहरे में काली अनमनी से बहती नज़र आ रही थी. सामने एक तंग घाटी में रंग-बिरंगी झंडियां दिखाई दीं. अनुमान लगाया कि इसे कालापानी होना चाहिए. नदी पर बने पुल के पास पहुंचे तो अनुमान सही साबित हुआ. आईटीबीपी ने इस जगह को काफी सुंदर ढंग से सजा रखा है. आगे काली मंदिर के पास एक प्राकृतिक स्रोत से निकल रही पानी की पतली धार को काली का उद्गम बताया जाता है. मंदिर के आसपास गलीचे बिछाकर सजाया गया था.

काली नदी के उद्गम पर स्थित मां काली का मंदिर

मंदिर के बगल में बने हॉल में हारमोनियम, तबला और ढोलक रखे हुए थे. मन तो हुआ कुछ देर महफिल जमा ली जाए लेकिन नाभी पहुंचना था और हमें मालूम नहीं था कि वहां पहुंचने में कितना वक्त लगेगा. आगे आईटीबीपी के बैरियर पर परमिट सम्बंधी औपचारिकता पूरीकर जैसी ही आगे बढ़े तो वहां दर्जनभर से ज्यादा रैनबसेरे दिखे. यह पांखा नाला पड़ाव था. कुछ खाने-पीने पर सहमति बनी तो एक दुकान में घुसे. पता चला यहां सिर्फ मैगी ही मिल सकती है. जब तक मैगी तैयार होती हम उस बाजारनुमा अनजानी गलियों में निकल आए. सभी घरों में में भेड़-बकरियों के मांस को माला बनाकर सुखाया जा रहा था. महक नाकाबिले बर्दाश्त थी तो वापस मैगी की दुकान में लौट आए. इस दुकान में कपड़े, जूते आदि दूसरा सामान भी था जिसे दुकानदार तिब्बती बता रहे थे. संजय ने अपने लिए जूता खरीद लिया. Sin La Pass Trek 10

मैगी को हलक से उतारकर आगे नाभीढांग की ओर बढ़े. आगे का रास्ता अचानक ही फैलता चला गया, बिलकुल तिब्बत के पठारों की तरह. हल्की चढ़ाई थी लेकिन नजारे इतने खूबसूरत थे कि थकान जैसे भाप की तरह गायब हो जा रही थी. अब कैसा नज़ारा होगा का आकर्षण हमें आगे खींचता जा रहा था. पठारों के नए-नए रूप हमें रोमांचित कर रहे थे. एक समतल सी जगह में पत्थरों से बने कुछ पड़ाव दिखाई दिए. यहीं पर नाभी से आ रहे कुछ ट्रैकर भी मिले. इनसे पता चला कि नाभी के लिए अब घंटेभर का रास्ता बाकी बचा है. उन्होंने बताया कि बादलों की वजह से वे ॐ पर्वत का नज़ारा लेने से वंचित रह गए. वैसे भी इस बार बर्फबारी कम होने से ॐ पर्वत में बर्फ भी कम ही है.

आगे हल्की चढ़ाई और फिर हल्के उतार के बाद आपस में सटी हुई चार छोटी-छोटी झोपड़ियां दिखाई दीं. इनका इस्तेमाल यहां से गुजरने वाले मजदूर और व्यापारी रैनबसेरे के तौर पर करते हैं. यहां से आगे तीखी चढ़ाई शुरू हो गई. चढ़ाई खत्म होते ही सामने आईटीबीपी का बैरियर था. जवानों ने हमारे परमिट चेक किये और अपने रजिस्टर में हमारी आमद दर्ज. हमें बताया गया कि हमारा परमिट यहीं तक का है. आगे लिपुलेख के रास्ते में बने मंदिर से आगे जाने की इजाज़त हमें नहीं है. साथ ही नीचे उनके कैंप की ओर नहीं जाना है और इधर नहीं जाना है. उधर नहीं जाना है…!

हमने उन्हें बाकायदा फौजी सैल्यूट देकर आश्वस्त कराया कि हम नियमों का पालन करेंगे तो वो हंस पड़े. आगे केएमवीएन के टीआरसी बैरकों में पहुंचे तो वे खाली मिले. वहां ड्यूटी दे रहे मैनेजर ने हमारे लिए एक बैरक खोल दी. क्या शानदार बैरक थी! तो ये है नर्म गद्दे के साथ गर्म रजाई! मैंने अपना छाता किनारे रख दिया. बाकी साथी भी अपने रुकसेक किनारे रख पंकज को घूर रहे थे. Sin La Pass Trek 10

जारी…

– बागेश्वर से केशव भट्ट

पिछली क़िस्त: गर्ब्यांग से गुंजी गांव की यात्रा

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बागेश्वर में रहने वाले केशव भट्ट पहाड़ सामयिक समस्याओं को लेकर अपने सचेत लेखन के लिए अपने लिए एक ख़ास जगह बना चुके हैं. ट्रेकिंग और यात्राओं के शौक़ीन केशव की अनेक रचनाएं स्थानीय व राष्ट्रीय समाचारपत्रों-पत्रिकाओं में छपती रही हैं.

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