परम्परा

कुमाऊनी लोक साहित्य में संस्कार गीत

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संस्कार गीत

संस्कार सम्बन्धी लोक गीत महिलाओं द्वारा गाये जाते हैं. यह प्रत्येक शुभ अवसर पर बच्चे के जन्म से लेकर यज्ञोपवीत, विवाह आदि जीवन से जुड़े शुभ संस्कारों से सम्बन्धित हैं. यह परम्परा रही है कि प्रत्येक कार्य का शुभारम्भ करते समय पारम्परिक शकुनाखर गीत गाया जाता है जो इस तरह से है-
(Sanskar Geet in Kumaoni Folk)

शकुना दे शकुना काज ए अतिनीको सा रंगीलो
पातल अञ्जली कमल क, फूल सो ही फूल मोलातान्त ए

इस गीत में सभी स्त्री और पुरुषों के नाम लिये जाते हैं. जन्मवार, नामकरण, आबदेव, यज्ञोपवित संस्कार, विवाह के अवसर पर देवताओं को स्त्रियाँ इस तरह गाकर निमंत्रण देती हैं-

प्रातः जो न्यूत तुम सुरिजए, किरणन को अधिकार
समाए वधाए न्यूतू ए आज बधाए न्यूतू ए.

इन पक्तियों के पश्चात सारे देवताओं का नाम आमंत्रित किया जाता है. नामकरण के पुण्य अवसर पर आशीर्वाद लेने हेतु पितरों को आमंत्रित करने के समय का गीत-

जाना-जाना भवरिल मध्य लोक पितरन न्यूतिए
कां रे होलो पितरन को द्वार ए, का रे होला पितर हमार

यज्ञोपवीत संस्कार

यज्ञोपवीत संस्कार जीवन का प्रमुख पुण्य संस्कार है. यह भारतीय संस्कृति का मूल संस्कार माना गया है. भारतीय संस्कृति के अनुसार यज्ञोपवीत संस्कार के पश्चात् बालक ब्रह्मचर्यं अवस्था का पालन करता है. यज्ञोपवित (जनेऊ) के समय बालक को जनेऊ तथा पीले वस्त्र ब्राह्मण द्वारा पहनाये जाते हैं. प्राचीन काल में बालक को यज्ञोपवित संस्कार के पश्चात् काशी विद्याध्ययन हेतु भेजा जाता था. इस संस्कार में यह पुण्य कर्म बतलाया जाता है. यज्ञोपवीत संस्कार के समय का गीत-

कैलें तो है बाला बटु शाल सुनै छौ  
कैलें तो है, बटु जनेऊ पैरें छौ

काशी जाते समय का गीत –

कैलें तो है बाला बटू काशी हू लगा छौ,
दादाज्यू तेरा दशरथ लै बवज्यू तेरा रामिचन्द्र लै
ममज्यू तेरा लछिमन निर्मोही लै बटू काशी सू लगा छौ

विवाह संस्कार

यह गृहस्थ जीवन में प्रवेश का पुण्य संस्कार है. यह सभी भारतीय धर्मों में प्रचलित संस्कार है. इस संस्कार के अभाव में स्त्री पुरूष दोनों को अपूर्ण माना गया है. भारत के विभिन्न अंचलों में विवाह के प्रत्येक कर्मों को गीत द्वारा व्यक्त किया जाता है. कुमाऊनी संस्कृति में भी महिलाएं विवाह से पूर्व गणेश पूजा लोक गीत को इस तरह से गाती हैं-

जय जय गणपति जय-जय सिद्धि विधायक…

परम्परानुसार वर एवं कन्या पक्ष की ओर से सुवाल पथाई महिलाओं द्वारा की जाती है. महिलाएं सुवाल पथाई के समय इस तरह कार्य शुभारम्भ करती हैं-

को ए, अ, पंडित लै कणिमी मोले छौ,
को ए, अ सुहागिली लै सुवलि बनै छौ.

जब दुल्हा कन्या के घर बारात लेकर आता है तो कन्या पक्ष की महिलाएं सामूहिक रूप से आमंत्रित स्वागत गीत इस तरह से गाती हैं-

जब ही महाराजा देश में आये,
देश में धूम मचैय्या हो
मथुरा के वासी कुम्भन कलश भरय्ये हो..

कन्या के घर बारात पहुंचते ही कन्या पक्ष की महिलाएँ वर के पिता को जानने की इच्छा इस तरह व्यक्त करती है-

छाजू में बैठी समधणि जछे को होलो दुल्हा को बाप ए…

कन्या दान के अवसर पर कन्या के माता-पिता, भाई-भाभी सगे सम्बन्धी द्वारा गड़ुवे की धार देते समय का गीत-

हाथ गड़ुवा ले माई ली, ढाड़ी.
हाथ गड़ुवा ले चाची ताई ढाड़ी.
तोडो-तोड़ो दादाज्यू कुश की डाली,
थर-थर करते बबज्यू हमारा…

कन्या दान के अवसर का गीत-

जनम जूहरा हार आये, रामिचन्द्र, लछीमन, जूहरा जीत लाये…

कन्या विदाई समय का गीत-

भय्या कहे बेटी नित उठ आए,
बाबा कहे छट मास आए.
विरन कहे बहिना काज परोसन भाभी कहे कछू काम…

विदाई के समय का हृदय विदारक गीत जो कन्या को ससुराल जाते समय उसके माता-पिता द्वारा शिक्षा दी जाती है इसे महिलाएं इस तरह गाती-

संभल-संभल पग धरियो लाडू देश विराना जाना है
सास विराना ससुर विराना सबको नेह लगाना है…

इस तरह के सभी गीतों को पूर्ण लिख पाना सम्भव नहीं है. फिर भी दो-चार पंक्तियों से ही लोक साहित्य में कुमाऊनी संस्कार गीतों का स्थान जाना जा सकता है. परन्तु अब लोक नृत्य का स्थान फोक डांस, ब्रेक डांस तथा पाश्चात्य संगीत ने ले लिया है. जिसकी जड़ें हमारे नवयुवकों में पैठ चुकी है.
(Sanskar Geet in Kumaoni Folk)

यह कहना तो उचित नहीं होगा कि लोक गीत तथा लोक नृत्य लुप्त सो चुके हैं, यह थे, और हैं. इन्हें ग्रामीण अंचलों ने कायम रखा हैं, आज ग्रामीण अंचलों के शिक्षित युवक भी विभिन्न संगठनों के माध्यम से चांचरी, छपेली, झोड़ा नृत्य, विभिन्न के अवसर पर प्रस्तुत कर रहे हैं. लेकिन हमारे पर्वतीय क्षेत्र के अंचलों तक ही यह सीमित है.

लोक नृत्य तथा लोक गीतों में से ही लोक साहित्य उत्पन्न हुआ है. इसी के आधार पर कुमाऊँनी संस्कृति जीवित है. कितनी सरसता, सहृदयता तथा नैसर्गिक सौन्दर्य का आभास मिलता है, लोक नृत्य तथा लोक गीतों में जो हमें हमारी परम्परा की याद दिलाते हैं. इसकी महत्ता जान लेने पर ऐसा प्रतीत होता है कि प्रकृति ने भी अपने सौंदर्य से कुमाऊंनी संस्कृति को संवारा है.

लोक-गीत तथा लोक नृत्य में ब्रह्मा-विष्णु, महेश, गणेश आदि देवताओं को प्रमुख माना गया है. श्री राम को आज भी भारतीय संस्कृति का आदर्श पुरुष माना गया है.

उपरोक्त विवेचन के अन्त में इतना ही कहना उचित होगा कि जिस आधार पर हमारे लोक साहित्य का नाम है उसे क्रमशः भविष्य में जारी रहने की सम्भावना तभी हो पायेगी जब आज का शिक्षित युवा वर्ग कुमाऊँनी संस्कृति की महत्ता को जानकर उसके आधार पर चलने के लिए खुद सक्षम बनने तथा आने वाली पीढ़ी को भी संस्कृति के प्रति जागरुक रखने का संकल्प ले सके.
(Sanskar Geet in Kumaoni Folk)

कंचना पाण्डेय

कंचना पाण्डेय का यह लेख ‘श्री लक्ष्मी भंडार हुक्का क्लब, अल्मोड़ा’ द्वारा प्रकाशित प्रतिष्ठित पत्रिका पुरवासी के 1992 के अंक में छपी थी. काफल ट्री में यह लेख पुरवासी पत्रिका से साभार लिया गया है.

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