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मसूरी में राहुल सांकृत्यायन

25 सितम्बर को बैरिस्टर श्री मुकुन्दीलाल ली आये. मुकुन्दीलाल जी अपने क्षेत्र में वही स्थान रखते हैं, जो कि जायसवाल जी बिहार में. दोनों आक्सफोर्ड के स्नातक और बैरिस्टर है. जायसवाल जी बैरिस्ट्री उखड़े नहीं, बढ़े हुए खर्च के लिए पर्याप्त न होने पर भी वह महीने में चार-पांच हजार कमा लेते थे. मुकुन्दीलाल जी जमे नहीं. रियासत की चीफ जजी करने चले गये. एक मर्तबा कुछ वर्षों के लिए आप स्थान भ्रष्ट हो जाइये, तो फिर प्रेक्टिस जमाना मुश्किल हो जाता है. जायसवालजी की तरह मुकुन्दीलाल जी भी हिन्दी को आदर की दृष्टि से देखते हैं और कभी-कभी उसमें लिखते भी हैं. लेकिन, अपने सभी बढ़िया अण्डों को उन्होंने अंग्रेजी की एक ही टोकरी में रखा, यह गलती थी. उनके गम्भीर और सुन्दर लेख अंग्रेजी के बड़े-बड़े पत्रों और पत्रिकाओं में निकलते थे. चित्रकला, विशेषकर पहाड़ी कलम, उनका अपना प्रिय विषय है. उस पर उनके सचित्र लेख कीमती पत्रिकाओं में छपे हैं. अंग्रेजों के राज्य के समय यदि फुर्सत निकालकर अपने विषय पर बड़ी पुस्तकें लिखते, तो छपने में कोई दिक्कत नहीं होती. लेकिन आजकल अंग्रेजी के समर्थ प्रकाशक भी अंग्रेजी पुस्तकों में प्रकाशन में रूपया लगाने की बड़ी हिचकिचाहट दिखलाते है.

कला की पुस्तक तो खैर बीस वर्ष में भी अपने खर्च को नहीं निकाल सकती. मैं उनको देखकर अपने भाग्य को सराहता था. उन्होंने यदि एक टोकरी (अंग्रेजी) में अपने सारे अण्डे रखे, तो मैंने भी एक टोकरी अर्थात हिन्दी में सब कुछ लिखा. दो-चार पुस्तकें तिब्बती में या दो-चार संस्कृत में यों ही लिखीं. हिन्दी के लिए दिन पर दिन अनुकूल समय आता गया और अब सौ-सौ फार्म की पुस्तक लिखने पर भी यह सोचकर झंखने की जरूरत नहीं कि इसे प्रकाशित करवाने वाला कहां मिलेगा. मुकुन्दीलाल जी सही अर्थों में सुशिक्षित और सुसंस्कृत पुरूष हैं. जब भी उनके साथ बात करने का मुझे मौका मिलता है, मालूम होता है, हम दोनों की बगल में जायसवालजी बैठे हुए हैं- मुकन्दीलालजी का जायसवाल जी से घनिष्ठ परिचय था. इस समय मैं ‘गढ़वाल ’ लिखने जा रहा था. मुकुन्दीलालजी गढ़माता के योग्य पुत्र हैं और उसके इतिहास और संस्कृति का गम्भीर परिचय रखते हैं. उन्हीं से मालूम हुआ कि परसों टेहरी के महाराज नरेन्द्रशाह नरेन्द्रनगर से अपनी मोटर पर ऋषिेकेश जाते, खड्ड में गिरकर मर गये. शराब में धुत होकर कार हांकना कभी न कभी ऐसा परिणाम जरूर लाता है. बकरे की मां कितने दिनों तक खैर मनाती. महाराजा नरेन्द्रशाह निरंकुशता को पसन्द करते थे, लेकिन शिक्षित और योग्य थे.

बंगले में फ्लश की कमी खटकती थी. युगों से हाथ से पखाना साफ होता रहा है, मसूरी में भी अधिकांश बंगले फ्लश के बिना हैं, पर मुझे उसका अभाव बहुत खटकता था. देहरादून के गुप्ता सेनिटरी स्टोर्स वालों ने अपनी योजना दी. मैंने उसे मंजूर किया. लेकिन, फ्लश के तैयार होने में अगले साल के आरम्भ तक की प्रतिक्षा करनी थी.

शरद पूनों बड़ी प्यारी होती है. मसूरी में अक्सर उस दिन आकाश निरभ्र होता है. ऊपर नीले आसमान में सोलह कला से उगे चन्द्रदेव, नीचे देवदारों के नोकदार उच्च वृक्षों, बान (बजांठ) के घने पत्तों और खुली तथा ढंकी जमीन पर फैली हुई चांदनी. इस एकान्त स्थान में रात को नीरवता जल्दी छा जाती थी, और कभी कभी कोई चिड़िया निश्चित सेकेन्ड के बाद अपनी आवाज देती सारी रात बोलती रहती. चांदनी सामने की हिम-शिख पंक्ति पर और भी तेज हो गई. इस समय हिमश्रेणी पर बादल नहीं था. रजतनगरी के उतुंग विशाल सौधों की भांति हिमालय दिखाई पड़ रहा था, यद्यपि सुस्पष्ट नहीं था. हिमालय लाखों नहीं, बल्कि करोंड़ों वर्ष की तरह रहा होगा. शरद पूनों की यही छटा रहती होगी, पर सारा श्रृंगार बेकार है, यदि उसको देख कर तारीफ करनेवाला न हो. मनुष्य ने ही पृथ्वी पर आकर इस सौन्दर्य के मूल्य को बढ़ाया.

26 अक्टूबर को सारनाथ से भिक्षु धर्मलोक आये. हमारी बिरादरी बहुत बढ़ी हुई है. घुमक्कड़ तो अपने हैं ही, तिब्बत और तिब्बती से सम्बन्ध रखनेवाला भी बन्धु है और बौद्ध भिक्षु तो घुमक्कड़ और बौद्ध दोनों होने के नाते. साहित्यकार भी सहोदर है, कम्युनिस्टों के बारे में तो कहना हीं नहीं. बहुत वर्ष हो गए एक अंग्रेज योग-रहस्यवादी विद्वान डॉ. इबेंज्वेन्ज ने योगाश्रम खोलने के लिए ऋषिकेश में 35 एकड़ भूमि ली थी. अब आश्रम खोलने की सम्भावना नहीं रह गई, इसलिए उन्होंने इसे महाबोधि के सभा को और कुछ पैसों के साथ देना चाहते थे. सभा ने धर्मालोकजी को जमीन देखने के लिए भेजा था. वह उसे देखकर यहां आये थे. कह रहे थे, वहां मच्छर बहुत हैं. ऋषिकेश से थोड़ा हटकर जमीन थी. पास में ही मीरा बहिन ने ‘पशुलोक’’ खोल रखा था. मैंने कहा- ‘‘दोनों लोक एक जगह रहे, अच्छा होगा लेकिन, जगह को संभालते वक्त मसूरी में भी एक जगह लेनी जरूरी होगी.’’ उन्होंने पूछा- ‘‘क्यों?’’ मैंने कहा -‘‘मलेरिया में लोग जब महीनों बीमार रहेंगे तो उनके लिए एक स्वास्थ्यकर जगह भी चाहिए.’’ अगले दिन धर्मालोकजी गये और उसी दिन भैया और भाभीजी भी. उनके साथ ही वह ऋषिकेश गये. भैयाजी अपनी याददाश्त ताजा करने के लिए लक्ष्मण झूला के महन्त रामोदारदास के पास भी गये. अपनी घुमक्कड़ी के समय उन्होंने तरूण रामोदार दास को वहां के पहले महंत के पास रखवा दिया था. मैं भी वैरागी रहते उनका नाम सुन चुका था, क्योंकि मेरा भी नाम उस समय वहीं था. 1943 में मैं लक्ष्मणझूला गया और उनके मठ के कई मकानों के विस्तार को भी देखा. न जाने कहां से मैंने खबर सुन ली थी कि अब वह इस दुनिया में नहीं है. इसे अपनी जीवन यात्रा में भी लिख मारा. भैयाजी ने उसे पढ़ लिया था.

अक्टूबर के अन्त तक जाड़े का आगमन हो चुका था. फूल सूख गये थे. गिरनेवाले पत्ते गिरकर पेड़ों को नंगा कर चुके थे. सफेदा, बीरी, पांगर (चेस्टनट) नासपाती सभी कांटे हो गये थे. हमारे लिए पहले-पहल जाड़ा मसूरी में आनेवाला था, उसके बारे में जानकार लोगों से हम जानकारी प्राप्त करने की कोशिश करते थे. मिस पूसांग और उनके परिवार से अब अच्छा परिचय हो गया था. वह बतला रही थीं- ‘‘ 1945 में बर्फ इतनी अधिक पड़ी कि आना जाना रूक गया. 60 रूपया लगाकर हमने रास्ता बनवाया. छतों पर इतनी बर्फ पड़ गई कि कितनी टूट गई और कितनों की दीवारें धंस गई.’’ देखना था, इस साल कैसा जाड़ा होगा.

यह लेख पहाड़ पत्रिका से साभार लिया गया है.

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Girish Lohani

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