Featured

आज का लोकतंत्र और कटरा बी आर्ज़ू

कटरा बी आर्ज़ू जब पहली बार मैंने पढ़ना शुरू किया था तो यह मुझे साधारण से मुहल्ले की कहानी लगी थी-जैसा हर मुहल्ला होता है. राही साहब की पाठकों से सीधे एक रिश्ता बना लेने और अपने पाठ के बारे में एक विश्वसनीयता कायम कर लेने की खासियत के चलते मुझे उनके उपन्यास बेहद प्रिय रहे. इस उपन्यास के साथ भी यही हुआ. जैसे ही थोडा़ आगे बढे़, पाया कि हम एक कुचक्र के गवाह बनने जा रहे हैं-जो हमारे सामने कई दशकों से रचा जा रहा है. अंततः वह कुचक्र इमरजेंसी के रूप में हमारे सामने आया.

कटरा बी आर्ज़ू शायद पहला हिंदी उपन्यास है जो देश की संसदीय प्रणाली और लोकतंत्र के बारे में भ्रमों को इतनी स्पष्टता से दूर करता है. अब भी अनेक लोग मिल जायेंगे, जो यह विश्वास करते हैं कि संसद के होते हुए, न्यायपालिका के होते हुए और फिर मीडिया के होते हुए हम पर फ़ासिज़्म थोपा नहीं जा सकता. मगर इमरजेंसी और कुछ नहीं थी सिवाय फ़ासिज़्म के. उन काले दिनों के बारे में बहुत कुछ कहा-लिखा जा चुका है. आपातकाल संसद के ज़रिये ही लगाया गया था. और तब न तो मीडिया और न न्यायपालिका की कुछ खास कर पाये थे.

आज भी वैसे ही हालात हैं. बल्कि उससे बदतर. और अब तो आपातकाल की भी कोई ज़रूरत नहीं रही. संसद चलती रहती है, अदालतों में रोज़ इजलास बैठती है, अखबार हैं, चैनल हैं और गुज़रात में हज़ारों अल्पसंख्यकों को कत्लेआम से नहीं बचाया जा सका, आदिवासियों को उनकी ज़मीनों से खदेडा़ जा रहा है और कोई उनकी नहीं सुनता, नर्मदा घाटी के हज़ारों परिवारों को उनके घरों से खदे़ड़ दिया गया है, उनके लिए पुनर्वास की कोई व्यवस्था किये बगैर उनके घर डुबा दिये गये हैं. विरोधियों के लिए जेलें और पुलिस की गोलियां हैं, दमन के तमाम उपाय हैं. क्या आपतकाल में इससे अलग कुछ होता है?

और ऐसे में याद आता है ज़र्मनी का अतीत. हिटलर भी संसद के ज़रिये ही सत्ता में आया था. तो संसद ऐसी चीज़ नहीं है कि उससे आश्वस्त हुआ जाये, और अदालतें, और मीडिया…

और ऐसे में राही मासूम रज़ा के कटरा बी आर्ज़ू की याद आती है… जो हमें बताता है कि सपने कैसे कुचल दिये जाते हैं, और लोगों के मुंह से रोटियां कैसे छीन ली जाती हैं, और यह कि एक जनविरोधी व्यवस्था कभी लोकतांत्रिक मूल्यों की वाहक नहीं हो सकती, भले ही वह लोकतंत्र के स्थूल उपादानों जैसे संसद, संविधान आदि को बने रहने दे. राही का यह उपन्यास इमरजेंसी के बहाने देश को मिली आज़ादी के छद्म को भी उजागर करता है.

 

दिल्ली में रहनेवाले राहुल पाण्डेय का विट और सहज हास्यबोध से भरा विचारोत्तेजक लेखन सोशल मीडिया पर हलचल पैदा करता रहा है. नवभारत टाइम्स के लिए कार्य करते हैं. राहुल काफल ट्री के लिए नियमित लिखेंगे.

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Kafal Tree

Recent Posts

कुमाऊँ की विलुप्त होती जन्माष्टमी पट्ट-चित्र परम्परा

कुमाऊँ में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी केवल भगवान कृष्ण के जन्म का धार्मिक पर्व नहीं रही है,…

2 weeks ago

बद्रीदत्त पांडे और इंद्र सिंह नयाल ने रखा था ‘उत्तराखंड राज्य की संकल्पना’ का वैचारिक आधार

पिछली कड़ी : पहले समाज बदलो, राज्य अपने आप सार्थक हो जाएगा : इंद्र सिंह नयाल इन्द्र…

2 weeks ago

आकर्षक कलेवर में आंचलिक परिवेश की किताब “टुकड़ा-टुकड़ा जिंदगी”

पूरी तरह आंचलिक परिवेश में तैयार, "टुकड़ा टुकड़ा जिंदगी" वरिष्ठ इतिहासकार डॉ निर्मल जोशी की नव प्रकाशित…

2 weeks ago

भूख न तीस न डर न फिकर छ्, मुट्ट बोटीं छन कसीं कमर छ्

ये सितंबर 1994 की सुबह थी जब खटीमा में पूर्व सैनिकों का जुलूस निकल रहा था. पूर्व…

2 weeks ago

उत्तराखण्ड के सरोवर

उत्तराखण्ड को सामान्यतः हिमालय, नदियों, झरनों और जलधाराओं की भूमि के रूप में जाना जाता है. किंतु…

2 weeks ago

दौड़ता अल्मोड़ा : फ़ोटो निबंध

पिछले 3 सालों से अल्मोड़ा के कुछ जागरूक युवा अल्मोड़ा मानसून मैराथन का आयोजन कर रहे हैं,जिसमें…

2 weeks ago