पहाड़ और मेरा जीवन – 25
ठूलीगाड़ में मैं चौथी कक्षा में आया था और सातवीं करने के बाद एक साल के लिए राजस्थान चला गया. जहां देवली नामक जगह से मैंने आठवीं कक्षा पास की. वहां फर्श पर टाट बिछाकर बैठते थे. वहीं मेरा एक सहपाठी हुआ करता था फहीम अख्तर जिसके साथ मैंने बहुत क्रिकेट खेला. कुछ समय पहले मैं दोबारा उससे संपर्क में आया. भला हो फेसबुक का. उसी से मैंने उन दिनों हमें अंग्रेजी पढ़ाने वाले देवीशंकर सर का नंबर लिया, जिनके बेटे की शादी अभी पिछले सप्ताह ही थी. मैंने उनसे छत्तीस साल बाद फोन पर बात की. मैं जानना चाहता था कि वे मुझे पहचान पाते हैं या नहीं क्योंकि उनके विषय में मैं पूरे स्कूल का टॉपर था, हालांकि पूरे साल में मैंने पांच घंटे भी अंग्रेजी नहीं पढ़ी होगी लेकिन क्योंकि मैं केंद्रीय विद्यालय में पढ़ा था, जहां कक्षा पांच में ही रीता मैडम से मैंने अंग्रेजी का व्याकरण अच्छी तरह सीख लिया था, मेरे लिए राजस्थान के इस सरकारी स्कूल की अंग्रेजी बहुत सरल साबित हुई. देवीशंकर सिंह सर से उस दिन ठीक से बात नहीं हो पाई क्योंकि वे पुत्र के विवाह में व्यस्त थे, हालांकि उन्होंने नाम सुनकर मुझे पहचान लेने का दावा किया. उनसे कभी बाद में बात होगी लेकिन ठूलीगाड़ में रहते हुए मेरे चौथी से सातवीं तक केंद्रीय विद्यालय में पढ़ते हुए इतने सारे वाकये हैं कि क्या जो लिखूं सोचने लग जाता हूं. आज मैं क्रिकेट के खेल के प्रति अपने प्रेम के बारे में बताना चाहूंगा, जो बाद में इस रूप में भी सामने आया कि मैंने उन्मुक्त को तीन साल की उम्र में ही बैट थमा दिया.
आप लोगों को बूबू के बारे में तो बता ही चुका हूं. बूबू ठूलीगाड़ में हमारे मकान मालिक के पिताजी थे. उन्होंने दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान बर्मा के फ्रंट पर भारतीय सेना की ओर से जंग में भाग लिया था और अब वे रिटायर्ड जीवन जी रहे थे. जिस जमीन पर वह रहते थे, उस पर सरकार की टेढ़ी नजर थी, पर बूबू वहां आने वाले सरकारी नुमाइंदों की ऐसी कम तैसी कर देते थे. फिर एक बार जब इंदिरा गांधी पिथौरागढ़ आई थीं, उन्होंने घर के नीचे से गुजर रहे उनके काफिले को रोककर उन्हें एक चिट्ठी थमा दी थी. इस घटना के बाद किसी की हिम्मत नहीं हुई बूबू को परेशान करने की. बूबू सेना से भले ही सेवानिवृत हो गए थे, पर काम करने से उन्हें कोई रोकने वाला नहीं था. काम करने के मामले में बूबू के सामने उनके पुत्र भी कुछ न थे. बूबू सुबह ही खेतों में काम शुरू कर देते. वे मौसम के मुताबिक सब्जियों की खेती करते थे. खेतों में उग आई खरपतवार को साफ करना, समय-समय पर उनकी गुड़ाई, रोज पानी देना, जैसे काम तो वे खुद कर लेते थे, लेकिन फसलों को कीड़ा न लगे, इसके लिए उन्हें मशीन चलानी पड़ती थी और यही काम उनसे न होता था. इसके लिए वे अक्सर मुझे खोजते क्योंकि मेरे भीतर जोश की कमी न थी. मुझे सिर्फ एक बार चुनौती पेश करने की देरी होती थी- सुंदर, सारे खेतों की क्या दो घंटे में गुड़ाई कर सकता है? सारे खेतों में क्या एक घंटे में दवाई छिड़क सकता है? चुनौती मिलने के बाद मैं किसी और चीज की परवाह नहीं करता था. मेरी हथेलियों में जाने कितनी बार बड़े-बड़े छाले निकले और जाने कितनी बार मैंने लगभग असंभव लगने वाली चुनौतियों को पूरा करके दिखाया. चुनौती मिलने पर उसमें विजय प्राप्त करना ही मेरा ईनाम होता था.
फिर कुछ यूं हुआ कि इन्हीं दिनों मेरी क्रिकेट में दिलचस्पी बढ़नी शुरू हुई. बढ़ते-बढ़ते वह इस कदर बढ़ी कि न सिर्फ मैं खुद जब देखो क्रिकेट खेलता, जिन दिनों इंडिया का कोई मैच चल रहा हो, तो उसकी कमेंट्री भी खूब सुनता. हमारा अपना रेडियो अक्सर आधा खुला हुआ रहता क्योंकि मेरे पिताजी जो कि फौज में कोर ऑफ सिगनल्स में रहे थे, रेडियो बनाने में माहिर थे. अपने रेडियो पर वे कुछ न कुछ प्रयोग कर ही रहे होते थे. ऐसे में मेरी नजर बूबू के रेडियो पर लगी रहती. बूबू इस रेडियो पर ज्यादातर सरकारी खबरें और बीबीसी की खबरें सुनते थे, वह भी शाम ढल जाने के बाद. दिन में रेडियो उनकी अलमारी में पड़ा रहता था. एक-दो बार बूबू ने मुझे ऐसे ही रेडियो सुनने को दे दिया. लेकिन उन्हें यह नागवार गुजरा कि मैंने रेडियो एक बार जो चलाया तो पांच-छह घंटे लगातार सुनता रहा. बूबू चिल्लाए – सेल पेड़ पर नहीं लगते हैं. अब यह उनका अपनी बात कहने का नायाब ढंग होता था. वे सीधे-सीधे बात नहीं कहते थे. दो-चार बार उनसे रेडियो मांगने गया, तो एक दिन रेडियो मेरे हाथ में थमाते हुए बोले- पीछे के खेतों की गुड़ाई करके आ पहले. मैच शुरू होने में पंद्रह मिनट थे. मुझे इत्मीनान से कमेंट्री सुनने का शौक था. मेंने जल्दी से बड़ा वाला बोसा उठाया और ये दे, वो दे, पंद्रह मिनट में खेत खोदकर बूबू के सामने खड़ा हो गया- दो अब रेडियो.
बूबू ने जब देखा कि रेडियो के बिना मेरा जीना मुहाल हुआ जा रहा है, तो धीरे-धीरे उन्होंने अपनी मांगें बढ़ानी शुरू कर दीं- पहले जरा कंट्रोल की दुकान से चीनी और तेल ला दे. पहले सारे खेतों में दवा दे दे. पहले कोयले के बुरादे के लड्डू बना दे. सर्दियों के दिनो में बूबू रोज शाम ढलते ही अंगीठी जला लेते. यह अंगीठी उनके कमरे में रहती थी. अंगीठी में जलाने के लिए बूबू फौजी कंट्रोल की दुकान से बहुत सस्ते दाम में बोरी भर-भरकर कोयले का बुरादा ले आते. यह देखकर कि उन्हें कुछ घंटों के लिए रेडियो देने की ऐवज में ऐसा बंदा मिल गया था जो पूरा बोरी भर बुरादे को एक ही दिन में खूबसूरत लड्डुओं में बदल देता था, उन्होंने साबुत कोयला लाना बिल्कुल बंद ही कर दिया. वे अपने कमरे के ठीक सामने मिट्टी के दालान के एक कोने में बोरी भरकर कोयले का बुरादा डाल देते और वहीं एक बोरी बिछा देते. मैं उनसे रेडियो ले लेता. इधर कमेंट्री चलती रहती और उधर मैं कोयले के लड्डू बनाते रहता. मैं इतना बड़ा आशावादी था, और आज भी हूं, कि भारत के नौ खिलाड़ी भी आउट हो जाते अगर और जीत के लिए सौ रनों की भी जरूरत होती, तो भी मैं बहुत रुचि से कमेंट्री सुन रहा होता था कि कुछ ऐसा जादू होगा कि भारत जीत जाएगा. आप लोग मुझे खब्ती समझेंगे पर आज मैं आपके सामने राज खोल ही देता हूं कि 1983 के विश्वकप में जिम्बाब्वे के खिलाफ जब भारत के 17 रनों पर पांच खिलाड़ी आउट हो गए थे, मैं ही पूरी दुनिया में अकेला रहा होऊंगा, जिसने कहा कि आज तो कपिल देव सेंचुरी मारेगा और मैंने एक क्षण के लिए भी रेडियो नहीं छोड़ा. उस मैच में अंतत: क्या हुआ, यह आप सबको पता ही है. लेकिन यह सुनील गावसकर, वेंगसरकर, चेतन चौहान, गुंडप्पा विश्वनाथ, मोहिंदर अमरनाथ आदि किसी को मालूम न होगा कि कैसे मैं कोयले के बुरादों को लड्डुओं में तब्दील करता हुआ उनके रन बनवाता था. करसन घावरी और वेंकट राघवन को भी क्या पता होगा कि मैंने अपने जादू से उन्हें कितने वकेट दिलवाए. इन खिलाड़ियों को तो कुछ न मालूम था, लेकिन बूबू को जरूर यह बात अच्छे से पता थी कि उनके पास एक मशीन आ गई है, जिसमें रेडियो की कमेंट्री पड़ने पर वह उनके लिए रोबॉट से भी बढ़िया काम करती है. रेडियो देकर उन्होंने मुझसे क्या जो काम नहीं करवाया होगा!
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