मैं पिछले दस साल से मैराथन दौड़ रहा हूं. मैंने यह शुरुआत जनवरी, 2012 में स्टैंडर्ड चार्टर्ड मुंबई मैराथन कहलाने वाली फुल मैराथन से की थी. मैराथन दौड़ने की जहां तक बात है, तो ज्यादातर होता यह है कि लोग पहले कुछ साल 21 किलोमीटर की हाफ मैराथन दौड़ते हैं. एक बार शरीर की दौड़ने वाली मांसपेशियां जब विकसित हो जाती हैं, तो वे 42 किलोमीटर की फुल मैराथन की तैयारी शुरू करते हैं. लेकिन मैंने पहली ही मैराथन के रूप में 42 किलोमीटर की फुल मैराथन को चुना. न सिर्फ चुना, बल्कि मैराथन को लेकर अपने अज्ञान से जन्मे तमाम दर्दनाक अनुभवों के बावजूद उसे 4 घंटे 55 मिनट के सम्मानजनक समय में पूरा भी किया.
(Mind Fit 53 Column)
तब से अब तक मैं हाफ और फुल मैराथनों को मिलाकर हाफ सेंचुरी तो बना ही चुका हूंगा. अगर आप मुझ से पूछें कि इन पचास मैराथनों को दौड़कर आपने सबसे बड़ा सबक क्या सीखा, तो मैं बताऊंगा कि सबसे बड़ा सबक है- धीरे दौड़ना. मैं जब भी धीरे दौड़ा, उतना ही लंबा दौड़ा. मैं सबसे ज्यादा धीमा साउथ अफ्रीका की कॉमरेड मैराथन में दौड़ा था, जो कि सबसे अधिक लंबी थी- 90 किलोमीटर. वह भी डरबन शहर से पीटरमारिजबर्ग की पहाड़ी चढ़ाई में. मैंने वह मैराथन 10 घंटे 46 मिनट में पूरी की. मैंने मैराथन में जब-जब तेज दौड़ने की कोशिश की, तब-तब मैंने खुद को जल्दी ही थकते हुए पाया.
जिस तरह मैराथन दौड़ में धीमे दौड़ने वाला रनर लंबा दौड़ता है, जिंदगी में धीरे चलने वाला व्यक्ति लंबा जीवन पाता है. इस बात को चाहें, तो एक मंत्र की तरह अपने दिमाग में रख लीजिए. मैं जानता हूं कि हर व्यक्ति को मेरी यह बात उलटी लगेगी, क्योंकि प्रतिस्पर्धा के इस युग में सब गति की बात करते हैं. जो जितना तेज चलेगा, उतनी जल्दी मंजिल तक पहुंचेगा. लेकिन मैं अपने अनुभवों से कह सकता हूं कि अमूमन तेज चलने का मतलब जल्दी मंजिल तक पहुंचना नहीं होता. वह यात्रा को दर्दनाक जरूर बना देता है. जिंदगी में तेज चलने का मतलब है ज्यादा सोचना. हम जितनी तेज चलना चाहते हैं, मंजिल पर जितनी जल्दी पहुंचना चाहते हैं, उतना ही ज्यादा सोचते हैं. जितना ज्यादा सोचते हैं, उतना ही एनजाइटी में रहते हैं. जितना ज्यादा एनजाइटी में रहते हैं, उतना ही शरीर भीतर से कमजोर पड़ता जाता है.
कामयाबी की मंजिल तक हम तेज पहुंच पाएं या नहीं, मृत्यु के रूप में जिंदगी की मंजिल तक जरूर तेज पहुंच जाते हैं. ज्यादा सोचते हुए हम भूल जाते हैं कि हम जितना ज्यादा सोचेंगे, उतनी ही उथली और तेज सांस लेंगे. सांस जितनी तेज होगी, जीवन उतनी जल्दी समाप्त होगा. सांस की गति और जीवन की लंबाई को साबित करने के लिए कई उदाहरण दिए जा सकते हैं. खरगोश सबसे ज्यादा तेज सांस लेता है, तो उसका जीवन भी उतना ही छोटा होता है. कुत्ता तेज सांस लेने के चलते ही मात्र चौदह वर्ष जी पाता है. हाथी धीमी सांस लेता है, तो सौ वर्ष तक जीवन जीता है. कछुआ सबसे धीमे सांस लेता है. वह 300 वर्ष जीता है.
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सवाल यहां सिर्फ धीमी सांस लेने का नहीं, बल्कि सवाल है प्राणवायु ऑक्सीजन का. हम जितनी तेज सांस लेते हैं, हमारे शरीर में उतनी ही ऑक्सीजन कम होती है. यह बात भी ज्यादातर लोगों को उलटी ही लगेगी, क्योंकि सभी तेज सांस लेने का अर्थ ज्यादा ऑक्सीजन लेने से जोड़ते हैं. पर शरीर-विज्ञान के जानकार बताएंगे कि धीमी और गहरी सांस लेने से ही शरीर में ज्यादा ऑक्सीजन आ पाती है. तेज सांस लेने वह उतनी कम हो जाती है. मैंने पैट्रिक मैक्योन (Patrick Mckeown) की किताब ‘द ऑक्सीजन एडवांटेज’(The Oxygen Advantage) पढ़ते हुए इस तथ्य को समझा कि हम जितनी धीमी सांस लेंगे, उतनी ही लंबी सांस ले पाएंगे और जितनी लंबी सांस लेंगे, उतनी ही ऑक्सीजन हमारे शरीर में जा पाएगी.
बात सिर्फ ऑक्सीजन को लेकर नहीं है. जब हम तेज काम करने की कोशिश करते हैं, तो हमेशा हड़बड़ा जाते हैं. जबकि धीमे काम करते हुए हम सुव्यवस्थित बने रहते हैं. परीक्षाओं में जो लोग बहुत जल्दी-जल्दी लिखने की कोशिश करते हैं, अक्सर वही गड़बड़ियां भी करते हैं. यह जिंदगी हमें अनुभव करने के लिए मिली है, कोई सजा नहीं है यह कि जल्दी-जल्दी काट लें. इसीलिए जनाब बहुत तेज भागना बंद करें. थोड़ा सैर-सपाटे के मूड में भी जीवन का आनंद लें. धीमे चलने का अपना सुख है. धीमे चलने की अपनी सुरक्षा भी है. जिंदगी की रफ्तार को लेकर ईगो से न सोचें. बल्कि अपने अनुभवों से सीखें. यह न भूलें कि ज्यादातर दुर्घटनाएं तेज गति के कारण ही होती हैं.
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-सुंदर चंद ठाकुर
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कवि, पत्रकार, सम्पादक और उपन्यासकार सुन्दर चन्द ठाकुर सम्प्रति नवभारत टाइम्स के मुम्बई संस्करण के सम्पादक हैं. उनका एक उपन्यास और दो कविता संग्रह प्रकाशित हैं. मीडिया में जुड़ने से पहले सुन्दर भारतीय सेना में अफसर थे. सुन्दर ने कोई साल भर तक काफल ट्री के लिए अपने बचपन के एक्सक्लूसिव संस्मरण लिखे थे जिन्हें पाठकों की बहुत सराहना मिली थी.
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