पहाड़ों में आज भी शादी ब्याह, जनेऊ, नामकरण, श्राद्ध-भोज आदि में आज भी हमें पत्तियों द्वारा निर्मित कटोरीनुमा एक बर्तन देखने को मिल जाता है. पत्तों से बने इस कटोरीनुमा बर्तन को कहते हैं पुड़ा.
कुछ साल पहले तक पहाड़ों में इन्हीं समारोहों में हमने थालियों की जगह पत्तलों के देखा था जिसे पहाड़ों में पत्याल भी कहा जाता है. उससे कुछ और साल पहले जायेंगे तो दालों के भंडारण के लिये पत्तियों से बना एक और बर्तन याद आयेगा जिसे हम ख्वाका कहते थे.
जानते हैं जिन पत्तियों के बर्तन को हम पीछे छोड़ आये हैं उन्हीं पत्तियों के बर्तन पिछले कुछ सालों से बना रही है और लाखों कमा रही है. जर्मनी की एक कम्पनी है लीफ रिपब्लिक. यह कंपनी 2017 अपने देश में पत्तों से बने बर्तन बना रही है. आज के समय पूरे विश्व में उनके बर्तनों की मांग हैं.
फोटो : लीफ रिपब्लिक से साभार
इकोफ्रेंडली बर्तनों के नाम से यह कंपनी आज विश्व भर में मशहूर है. इसका बनाया पुड़ा पन्द्रह यूरो प्रति दस पुड़ा की दर से बिक रहा है. पन्द्रह यूरो मतलब आज के हिसाब से कहीं 1170 रुपये हुआ.
वैसे विश्व में वर्तमान में सर्वाधिक पत्तियों के बर्तन का व्यापर करने वाला देश थाईलैंड है. खैर फिलहाल आप सीखिये कि कैसे बनते हैं पत्तल, पुड़ा और ख्वाका.
पुड़ा बनाने के लिए दो चौड़ी पत्तियां चाहिये. ये पत्तियां तिमला, च्यूरा, मालू आदि की हो सकती हैं. दोनों पत्तियों को सटाकर रखा जाता है और दोनों पत्तों के कोनों को चोंचनुमा आकृति के साथ पकड़कर पतली सीकों से जोड़ दिया जाता है. विभिन्न संस्कारों में आज भी इसे आप अपने घरों में देख सकते हैं.
पत्यालों को भी तिमला, च्यूरा, मालू आदि की मज़बूत पत्तियों से बनाया जाता है. गोल आकर देकर इन्हें बांस की पतली सीकों से जोड़ा जाता है.
ख्वाका, दाल भंडारण के लिये प्रयोग में लाया जाने वाला पत्तियों का बना काफ़ी पुराना बर्तन है जो अब शायद ही प्रयोग में लाया जाता है. घड़े के आकार के इस बर्तन को मालू के पेड़ की पत्तियों और डंठलों से बनाया जाता है. इस बर्तन को आवश्यकता अनुसार छोटा बड़ा भी किया जा सकता है. इसमें दालों में कीड़े मकोड़े भी नहीं लगते.
भोज में प्रयोग होने वाले इन बर्तनों का एक फायदा यह था कि भोजन के बाद इन्हें घरेलू जानवरों को दिया जाता था. या फिर एक जगह इकट्ठा कर खाद भी बनाई जा सकती थी.
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