फोटो: जयमित्र सिंह बिष्ट
शिव को अनेक रूपों में पूजा जाता है उन्हीं रूपों में एक है शिवलिंग. पौराणिक कथानुसार माना गया है कि सबसे पहले शिव लिंग का पूजन उत्तराखंड की पवित्र भूमि से प्रारंभ हुआ. अल्मोड़ा जिले से 35 किमी की दूरी पर स्थित जागेश्वर धाम से जुड़ी मान्यता के अनुसार सर्वप्रथम शिव लिंग का पूजन इसी धाम पर किया गया.
(Legend of Shivling Worship)
भगवान शिव अपने ससुर दक्ष प्रजापति का वध करने के पश्चात तप करने को निकले थे. अपनी पत्नी सती की भस्म शरीर में अलंकृत कर भगवान शिव जागेश्वर मंदिर के समीप स्थित दंडेश्वर नामक स्थान पर समाधि पर बैठे.
देवदार के घने इन्ही जंगलों के बीच सप्तऋषि भी सपत्नी रहा करते थे. एक दिन जब सप्तऋषियों की पत्नियाँ जंगल की ओर गयी तो उन्होंने शिव को समाधिस्थ बैठा पाया. शिव के इस रूप को देखकर सप्तऋषियों की पत्नियाँ मूर्छित हो गयी.
(Legend of Shivling Worship)
देर तक आश्रम न लौटने पर ऋषियों ने जंगल का रुख किया. वहां अपनी पत्नियों को मूर्छित अवस्था में देख ऋषियों ने किसी अनहोनी की कल्पना कर ली. ऋषि, समाधिस्थ शिव को देख अत्यंत क्रोधित हुये. क्रोध में ऋषियों ने शिव को लिंग विच्छेद का श्राप दिया.
इस श्राप के कारण पूरे संसार में अंधकार छा गया और ब्रह्मांड में उथल पुथल मच गयी. सभी देवताओं ने शिव के क्रोध की अग्नि से बचने के लिये उनका मनन मानन शुरु किया. समस्या के समाधान के लिये ऋषियों से शिव सदृश्य लिंग की स्थापना करने की बात कही गयी.
ऋषियों ने शिव लिंग की स्थापना कर शिव की आराधना प्रारंभ की. उसी समय से शिव के लिंग स्वरूप की पूजा प्रारंभ हुई. माना जाता है कि ऋषियों और देवताओं द्वारा जागेश्वर स्थित शिवलिंग की ही स्थापना की गयी थी.
(Legend of Shivling Worship)
–काफल ट्री डेस्क
इसे भी पढ़ें: विष्णु द्वारा स्थापित बारह ज्योतिर्लिगों में से एक है जागेश्वर
Support Kafal Tree
.
काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री
काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें
उत्तराखंड अपनी निराली संस्कृति के लिए जाना जाता है. यहां के लोक जीवन के कई…
‘‘...हिमालय के दूर-दराज गाँव के अत्यंत विपन्न परिवार में जन्मा एक छात्र नोबेल विजेता भौतिकशास्त्री…
अल्मोड़ा के काफलीखान गांव के रवि टम्टा ने जब अपने बनाए फ्लाइंग व्हीकल "हापिडा स्काईनेक्स"…
उत्तराखंड के पहाड़ों में लोकगीत और लोकनृत्य केवल मनोरंजन के साधन नहीं, बल्कि यहां की सामाजिक-सांस्कृतिक…
पिछली कड़ी : हिमालय की सामाजिक-आर्थिक संरचना पर प्रोफेसर पूरन चंद्र जोशी कुमाऊं को विशिष्ट…
10 मार्च 2026 को ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखण्ड के वन मंत्री ने विधानसभा…