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जोहार घाटी का सफ़र भाग – 6

पिछली क़िस्त का लिंक – जोहार घाटी का सफ़र – 5

मुनस्यारी को जोहार घाटी का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है. मुनस्यारी तिब्बत जाने का काफी पुराना रास्ता है. उस वक्त जब तिब्बत से व्यापार होता था तो मुनस्यारी को व्यापारी लोग गोदाम की तरह प्रयोग करते थे. जोहार घाटी के दोनों ओर बीहड़ इलाकों में कर्इ छोटे-बड़े गांव बसे हैं. जोहार घाटी में रहने वाले जोहारियों को शौका कहा जाता है. वैदिक रीति रिवाजों को मानने वाले शौका लोगों का आजादी से पूर्व व्यापार ही आजीविका का मुख्य सहारा था. दुस्साहसिक यात्राएं करना जोहारियों की पहचान हुआ करती थी. 1947 से पहले जोहारियों की प्रमुख व्यवसायिक मंडियां मुनस्यारी, मदकोट, बागेश्वर, हल्द्वानी, रामनगर, टनकपुर तथा तिब्बत में ग्यानिमा, तरचैन, गरतोक आदि प्रमुख थे. तिब्बत की मंडियों मं मध्य एशिया के कर्इ देशों के व्यापारी का जमावड़ा रहता था. नमक, सुहागा व ऊन की आपूर्ति जोहारी व्यापारियों के द्वारा ही की जाती थी. आजादी के बाद भी तिब्बत के साथ छिट-पुट व्यापार चलता रहा. 1962 में चीन के आक्रमण के बाद तिब्बत के साथ व्यापार बंद होने से जोहार के गांव सूनसान हो गए और शौका लोग आजीविका के लिए अन्य जगहों में बस गए. 1967 में भारत सरकार ने शौका समुदाय को भोटिया जनजाति घोषित कर दिया. भोटिया लोग भी एक तरह से बुद्व से प्रभावित रहे. कहा जाता है कि 13 वीं तथा 14 वीं शताब्दी में भारत में मंगोलों के आक्रमण होने पर हिन्दू ब्राहमण हिंसा से बचने के लिए पहाड़ी इलाकों में चले गए. बाद में उनमें से कुछ वहीं बस गए और तिब्बती समाज के साथ घुल मिल जाने से उनके बीच व्यापारिक संबंध बन गए.

मुनस्यारी से लगा दरकोट एक छोटा गांव है. मुनस्यारी से 6 किमी दूर. यहां सौ साल पुराने खिड़कियां व दरवाजों में नक्काशी वाले पुराने आकर्षक मकान हैं. यहां हाथ की बुनार्इ से बने पशमीने व अंगूरा के शॉल के साथ ही भेड़ की उन के बने कंबल भी मिलते हैं. मुनस्यारी के नानसेन गांव में डा. शेर सिंह पांगती के घर में उनका बनाया एक अनोखा म्यूजियम है. लोग उन्हें मास्टरजी भी कह बुलाते थे. 2017 में 24 अक्टूबर को देहरादून में उनका निधन हो गया.डा. शेर सिंह पांगती को कुमाऊं के लोक कला का विशेषज्ञ कहें तो कोई अतिशियोक्ति नहीं होगी. उनका म्यूजियम काफी प्रसिद्व है. बीते जमाने की ढेर सारी यादगारों के साथ ही तिब्बत के साथ व्यापार के वक्त की चीजों को उन्होंने अपने म्यूजियम में संजो रखा है. जिनमें से रोजमर्रा की जिंदगी में काम आने वाली चकमक पत्थर तथा सूखी कार्इ, कप, बरतन, छोटा चमड़े का बैग, पारंपरिक आभूशण, हिरन की खाल का बैग सहित सौ साल पुरानी कर्इ अदभुत चीजों को संजो कर रखा है. कुमाउंनी भोटियाओं के तिब्बती खम्पा और डोक्पासों के आपसी व्यापार के वक्त के सामान को बचाकर रख खत्म होती संस्कृति को बचाना ही पांगतीजी ने अपनी जिंदगी का उदेश्य रहा. पांगतीजी के म्यूजियम में उनकी खुद की लिखी किताबों का संग्रह है.

मुनस्यारी, पर्वतारोही मलिका विर्धी की भी जन्म स्थली है. 1997 में भारत-भूटान-नेपाल के हिमालयी दर्रों को महिलाओं के एक दल ने पार किया. इस अभियान की लीडर मलिका ही थी. यही गांव सात बार एवरेस्ट फतह करने वाले लवराज धर्मशक्तू का पैतृक गांव तथा उनकी पत्नी रीना कौशल धर्मशक्तू का ससुराल भी है. रीना कौशल साउथ पोल पर जाने वाली पहली भारतीय महिला हैं.

33 साल के तिब्बती भाषा के जानकार नैन सिंह रावत जो कि मिलम गांव में स्कूल मास्टर थे, 1863 में उन्हें र्इस्ट इंडिया कम्पनी ने त्रिकोणमितीय सर्वे के लिए नियुक्त किया. इस महान सर्वेक्षण कार्य के लिए पंडित नैन सिंह को रायल ज्योग्रेफिकल सोसाइटी लंदन द्वारा 1877 में ‘पैट्रन्स मैडल तथा बिट्रिश शासन द्वारा ‘सीआइर्इ से सम्मानित किया गया. पंडित नैन सिंह की स्मृति में भारत सरकार ने 2004 में एक डाक टिकट भी जारी किया. पंडित नैन सिंह रावत के साथ ही 1855 से 1882 तक जोहार के किशन सिंह, कल्याण सिंह, मानी, दोलपा ने भी छदम रूप में तिब्बत, चीन, तुर्किस्तान तथा मंगोलिया के कर्इ क्षेत्रों का त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण कार्य किया. 1885 में बिट्रिश सरकार ने पंडित किशन सिंह को ‘रायबहादुर के अलंकरणों से विभूषित किया. दरअसल र्इस्ट इंडिया कम्पनी का तिब्बत से ऊन, सोहागा तथा सोना प्राप्त करने का स्वार्थ था. 1857 में स्लागिन्टवाइट बंधु एडोल्फ के काशगर में हत्या किये जाने तथा 1863 में तुर्गन विद्रोह के कारण विदेशियों का तिब्बत में प्रवेश बंद हो गया था. अंग्रेजों ने सर्वेक्षण कार्य करने के लिए 1861 में एक योजना बनाकर जोहार घाटी के रावत बंधुओं को सर्वे आफ इंडिया में प्रशिक्षण दिया. पंरपरागत व्यापार की वजह से इन्हें तिब्बत में प्रवेश करने की किसी भी प्रकार की कठिनार्इ नहीं थी. ये लोग तिब्बती भाषा तथा संस्कृति से पूर्णत: भिज्ञ तो थे ही तथा मंगोल मुखमुद्रा के कारण छदम रूप से कार्य कर सकते थे.

2200 मी. की ऊंचार्इ पर मुनस्यारी में तब टीआरसी के साथ ही बारह लाज थे. अब तो यहां इनकी बाढ़ सी आने लगी है. पंचाचूली के दीदार करने के लिए पर्यटकों की यहां खुब आवाजाही रहती है. अब तो मुनस्यारी काफी फैल गया है. जोहार के शौकाओं ने मुनस्यारी के आस-पास अपने आसियाने बना लिए हैं. ज्यादातर मौसम सुबह-शाम का ठंड लिए रहता है. जाड़ों में बर्फ की सफेद चादर चारों ओर बिछी रहती है. जाड़ों में बर्फ गिरने पर बैटूली धार व खलिया टाप जो कि मुनस्यारी से मात्र सात किमी की दूरी पर हैं, में स्कींइग भी होती है.

शाम होते-होते मेघ फिर से बरसने लगे थे. हम सभी कल की तैयारी में जुटे थे. तभी हमारा पुराना मित्र वीरू बुग्याल मिलने आ गया. वीरू का तबका रेस्टोरेंट अब अच्छा खासा होटल बन गया है. वो टूर आपरेटिंग का भी काम करते हैं. वीरू प्रशासन वआर्इटीबीपी के द्वारा पर्यटकों को परेशान करने की कारगुजारी से बहुत ही खिन्न था. वीरू ने बताया कि, ‘लीलम गांव को जाने वाला पैदल रास्ता तो धापा से सड़क बनाने वालों ने खत्म कर दिया है. घोड़े भी एक साल से उप्पर जोहार में ही हैं. पर्यटन तो खत्म ही कर दिया है सबने. मुनस्यारी में तहसील प्रशासन और आर्इटीबीपी की कारगुजारी ऐसी है कि यहां पर्यटक दोबारा आने से कतराने लगा है. पासपोर्ट होने के बावजूद भी पर्यटकों को परेशान किया जाता है. मिलम तक जाने के लिए जो परमिट बनता है उससे ज्यादा आसान तो पासपोर्ट बनाना है. वीरू काफी देर तक ये दुखड़ा कहते रहा. तब तक हम अपना सामान पैक कर सुबह चलने की तैयारी कर चुके थे.

( जारी )

 

बागेश्वर में रहने वाले केशव भट्ट पहाड़ सामयिक समस्याओं को लेकर अपने सचेत लेखन के लिए अपने लिए एक ख़ास जगह बना चुके हैं. ट्रेकिंग और यात्राओं के शौक़ीन केशव की अनेक रचनाएं स्थानीय व राष्ट्रीय समाचारपत्रों-पत्रिकाओं में छपती रही हैं. केशव काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.

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Girish Lohani

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