फोटो: सुधीर कुमार
मेरे घर रह जाना
-शिवप्रसाद जोशी
“मेरी सबसे सतत और सजीव स्मृतियां लोगों के बारे में उतनी नहीं हैं जितनी कि अराकाटका के उस घर के बारे में हैं जहां मैं अपने नानी नाना के साथ रहता था. ये ऐसा बारम्बार आता स्वप्न है जो अब भी क़ायम है. अपने जीवन के प्रत्येक दिन, मैं वास्तविक हो या काल्पनिक इस ख़्याल के साथ जगता हूं कि मैंने एक सपना देखा है जिसमें मैं उस विशाल पुराने घर में हूं. यही नहीं कि मैं वहां वापस चला गया हूं बल्कि मैं हूं वहीं, किसी एक ख़ास उम्र में नहीं, किसी एक ख़ास मक़सद से नहीं- मानो मैंने उसे कभी छोड़ा ही न हो. आज भी मेरे सपनों में रात के उन अपशकुनों का अहसास बना हुआ है जो मेरे तमाम बचपन पर क़ाबिज़ थे. ये एक बेक़ाबू सनसनी थी जो हर रोज़ शाम के वक़्त शुरू हो जाती थी और मेरी नींद में मुझे कुतरती रहती थी. (मुझे तभी निजात मिलती) जब मैं दरवाजे की दरार से सुबह का प्रकाश देख लेता था.”
अपने घर और अपने उद्दाम बचपन के बारे में प्रख्यात कोलम्बियाई कथाकार उपन्यासकार गाब्रिएल गार्सिया मार्केस ने ये वाकया अपने परम मित्र प्लीनियो एपीलियो मेंदोसा के साथ साझा किया था. जिसका ज़िक्र दोनों की बातचीत की किताब ‘फ़्रैगरेंस ऑफ़ ग्वावा’ में दर्ज है. मार्केस बताते हैं कि उनका घर लोगों से भरा हुआ था- नाना नानी, बुआएं, क्षणिक मेहमानों, नौकरों, इंडियनों के अलावा भूतों से भी. और शायद इसमे एक बड़ा भूत उनकी मां की अनुपस्थिति का भी था जो उन्हें वहां छोड़ गई थी. इस घर की याद और वहां घटनाओं का इतना भीषण बोलबाला मार्केस के बाल मन में कुछ ऐसा अंकित होता चला गया कि वो आगे चलकर उनका एक अब्सेशन, एक जुनून ही बन गया. घर की परिधियों और उसके भूगोलों से बहुत दूर निकल जाने के बाद भी मार्केस का मन उस घर में अटका रहा, वो उसकी तलाश करते रहे, उस फिर से बनाते रहे, और स्मृतियों का ऐसा जखीरा उनके पास जमा होता गया कि वो उसके उत्पात को एक दिन जब सह नहीं पाए तो लिखने बैठे. ‘द हाउस’ नाम की कोई रचना उनके ज़ेहन मे थी लेकिन वो कहानी तो कभी बन नही पाई अपने पहले उपन्यास ‘लीफ़ स्टॉर्म’ में उस घर की यादें दर्ज की लेकिन अपनी मुकम्मल धज के साथ अपने बचपन, उस घर और उस दौर और उस पुरानी यातना की आवाज़ें फूटीं उस उपन्यास में जिसने मार्केस को अपनी धरती का अपने घर का और पूरी दुनिया का विख्यात नागरिक बना दिया. मार्केस का घर के प्रति अब्सेशन का वो अभूतपूर्व विस्फोट था. उस किताब में इतना अद्भुत प्रकाश और ऐसा विस्तृत अंधेरा यूं ही नहीं आया है.
इस तरह एक घर एक किताब की तरह आपके साथ चलता रह सकता है. घर के बारे में जो भी अवधारणाएं और प्रस्थापनाएं आप बनाना शुरू करेंगे तो आगाज़ यहीं से होगा. एक किताब दिखेगी, कुछ पीले मुरझाए मुड़ेतुड़े पन्ने फड़फड़ाएंगें, कुछ पुरानी महक उठेगी एक झुटपुटा सा होगा जो सुबह होगी या शाम और आप एक जीवन में दाखिल होने के लिए लौटेंगे. ये लौटना भी जैसे अतीत की ओर बढ़ना है, घर की ओर. घर एक किताब है जिसमें से आप निकल आए थे एक वक़्त में और घर वहीं की वहीं रखी जसकी तस वही किताब है जिसमें आप लौटना चाहते हैं, लौट रहे हैं.
अतीत की एक महत्त्वपूर्ण किताब जैसा है घर. उसी की एक दीवार पर बने किसी ताखे में या उसी के एक कमरे की किसी आल्मारी में रखी हुई. इस तरह घर के भीतर घर सहेजा हुआ रखा रहता है.
इस घर में और क्या क्या है, मंगलेश डबराल की एक कविता बताती है.
एक आईने में चलते-चलते झलक जाता है
हरेक का अकेलापन
यहां एक पुराना दरवाज़ा है
जिसे खोलने पर मनुष्य की-सी एक आवाज़ आती है
पर्दे लंबे समय से एक ही जगह
टंगे रहने की थकान में सोये हुए हैं
कुछ आगे बैठने के लिए कुछ कुर्सियां हैं
ताकि यहां लोगों को खड़े खड़े जीवन न बिताना पड़ें
मेज़ पर रखा है एक गिलास पानी
नमक और खाने के लिए कुछ
इस घर की काया में रहते आए हैं हम
बरसों से आत्मा की तरह
उत्तराखंड को बने 15 साल हुए. एक बहुत पुराना मकान अपनी जर्जरता में जैसेतैसे एक गांव में खड़ा है. वो सिर्फ़ स्मृति में हिलता हुआ घर नहीं है वो वास्तविक रूप से हिल रहा है. ताज्जुब ये है कि दादा दादी का बनाया हुआ वो घर गिरता क्यों नहीं. आप उसके पास खड़े हो जाएं तो वो आपको हिलता हुआ महसूस होगा. या पता नहीं आपके भीतर ही कोई उत्पात ऐसे मौके पर आ बैठता होगा जो आपको हिला रहा होगा. गांव के उस घर के पास नये घर बने, वे भी दरकने दरकने को हुए इतने पुराने हो चले, फिर नये घर भी बनेंगे. बन ही रहे हैं. लेकिन मेरा ध्यान तो उसी घर पर अटका है जो बीचोंबीच किसी देवता की तरह खड़ा है. या जैसे कोई बहुत काली अभी अभी तालाब से उठकर मिट्टी गोबर घास से रंधी हई बड़ी सी भैंस पड़ी हो और धीरे धीरे अपनी गर्दन में बंधी घंटी की टुनटुन के साथ हिल रही हो. इस हिलती हुई भैंस को हिलाना मुश्किल है.
मैं भैंस पर चढ़ने से डरा. उसकी पीठ फिसलन भरी होती है और सींग पकड़ने से वो झटक न दे इसका डर रहता है. उसे मनुष्य से ज़्यादा काली और सफ़ेद चिड़िया चाहिए अपने पास. मैं भैंस से गिर गया था अपने नानीघर में, जहां तालाब था और भाइयों ने मुझ छोटे को शरारतन भैंस की सवारी कर दी. मैं डरा रोया और गिरा और लथपथ हुआ. मैं इस घर के सामने खड़ा हूं और याद कर रहा हूं कि कैसे बड़ी ताईजी की रसोई में दाखिल होते हुए उस संकरे से पत्थर पर पांव फिसला और मैं नीचे धड़ाम. अरे ये तो दो या तीन हाथ की ऊंचाई थी बस, पत्थरों को एक साथ करीने से परत परत लगाकर बनाई गई सीढ़ी. लेकिन जब गिरा था वो जैसे जीवन की किसी अन्यतम ऊंचाई से गिरना था. नीचे भैंस और उसका चारा और गोबर रहता था. उस समय भैंस वहां पर न थी और खूंटे से ज़रा दूर गिरा वरना हादसा बड़ा होता. घर की सबसे पहली स्मृति गिरने की है. मैं बड़ा होता हुआ कई बार गिरा. आप बाहर खड़े हो सकें ठीक से इसलिए आप बार बार घर में गिरते हैं. और जब आप कभी बाहर गिर जाएं तो लौटना चाहते हैं और रोने की हूक को किसी तरह, मुंह को हाथ से दबाते हुए दौड़ते दौड़ते घर आना चाहते हैं फिर से खड़े हो जाएं. वो आपको खड़ा कर दे. कोई हो वहां जो आपको खड़ा कर दे और देर तक रोने दे. और कुछ देर वहीं सुला दे.
सलमान रुश्दी का एक निबंध है इमेजिनरी होमलैंड्स. 1982 का लिखा हुआ है. ग्रांटा और पेंग्विन ने इसी नाम से निबंधों के एक संकलन में इसी शीर्षक से प्रकाशित है. अपना लेख वो इस तरह शुरू करते हैं:
“एक सस्ते से फ़्रेम में एक पुरानी तस्वीर उस कमरे की दीवार पर टंगी है जहां मैं काम करता हूं. ये 1946 में खींची गई एक घर की तब की तस्वीर है जब मैं पैदा नहीं हुआ था. ये मकान कुछ अजीब है- तीन मंज़िला नोकदार, ढलवां छतें और दो कोनों पर गोल स्तंभ, हरेक पर एक नुकीली छप्परदार टोपी. ‘अतीत एक पराया मुल्क होता है,’ इस प्रसिद्ध वाक्य के साथ एलपी हार्टले के उपन्यास ‘द गो बिटवीन’ शुरू होता है, ‘वहां सारे काम अलग अलग ढंग से किए जाते हैं.’ लेकिन ये तस्वीर मुझे इस विचार को पलटने को बाध्य कर देती है, ये मुझे याद दिलाती है कि मेरा वर्तमान ही पराया है, और अतीत घर है, हालांकि ये खोये हुए समय के कुहासे में खोये हुए शहर का एक खोया हुआ घर है.”
जैसे मेरा गांव का घर खाली है, वैसे ही बहुत से घर खाली हैं. बहुत से गांवों के बहुत से घर खाली हो चुके हैं. कुछ घर गिर गए हैं कुछ गिरा दिए गए हैं. कहीं घास और जंगल है तो कहीं दुकानें और मकान. कहीं भूस्खलन और बाढ़ की लंबी चौड़ी खरोचें हैं जैसे कुदरत बाघ बनकर घर पर और उसके खेत पर झपटी हो. या ये गिरते हुए किसी मनुष्य की अंगुलियों के निशान हैं और ये पहाड़ दरअसल कोई बहुत ऊंची दीवार होगी, वो कहीं ऊपर से गिरा होगा और दीवार को जहां तहां पकड़ने की कोशिश में उसके नाखूनों से मिट्टी उखड़ती हुई और निशान छोड़ती हुई झड़ रही होगी. क्या पहाड़ कोई मलबा है. धीरे धीरे झड़ता हुआ. गिरता हुआ और एक बेशुमार धूल में तब्दील होता हुआ.
क्या मेरा घर इसी धूल में कहीं रखा हुआ है. क्या ये धूल ही मेरा घर होगा. उत्तराखंड के पहाड़ों में ये बेचैनी चक्कर काट रही हैं. तमाम घरों की रूहें भटक रही हैं और अपनी जगह मांग रही हैं. लेकिन दिखता ये नहीं है. दिखता तो एक चमकीला रास्ता है बांध और रोशनी से भरा हुआ, गाड़ियों और लोगों से ठुंसा हुआ. वे यक़ीनन सैलानी होंगे या कारोबारी या महानगरों के सेठ, कंपनी डायरेक्टर, निर्माता निर्देशक. इतना चमकते हुए दलाल ही आते हैं. नयी इमारतें नयी सैरगाहें नये उजाले तो आ गये हैं. पुरानापन दृश्य में एक सनसनी की तरह रहता है. वह पर्यटन की रोचकता की वाह है, उसका सुरीला आश्चर्य. आह इन घरों में अब नहीं रहती. उन्हें लोग अपने साथ ले गए.
रघुबीर सहाय की एक कविता है ‘मेरा घर.’ देखें वो क्या देख रहे होंगेः
मेरी कविता में मां
मेरी कविता में बीवी-बच्चे
मेरी कविता में गौरेया बसन्त की
धूप और पानी के संस्मरण
सब वहीं रह गये
और मैं चल दिया
इनकी स्मृतियां रह गयीं
वहीं मेरे घर
जाओ जिसे यात्रा में दो दिन
पड़ाव हो
या तो मां मिलेगी
या उसकी याद में
धूप में खिला फूल
मेरे घर रह जाना.
तो आज जब घर के बारे में, घर की हिफ़ाज़त, बनावट, निर्माण, पुनर्निर्माण, संरचना, पुनर्रचना, घर लौटने, वहीं रह जाने के बारे में, एक नया गृहप्रवेश करने के बारे में सोचते हैं तो ये एक क़दम आगे रखना जैसा होता है लेकिन आज की हिदायतें, मशविरें, चेतावनियां, डर, ज़रूरतें, आकांक्षाएं, स्वप्न, इरादे, चालाकियां, रोज़मर्रा, जीवन, परिवार, बच्चे, गाड़ी, रिपोर्टें, सलाम नमस्ते, चिंताएं, घबराहटें और अवसाद दो क़दम पीछे करा देते हैं. यानी और आज की तरफ़ हम खड़े रहते हैं. आगे बढ़कर पीछे नहीं लौटा जाता. ये पलायन, विस्थापन और प्रवास सबका दर्द है.
प्रवास आप अच्छे जीवन अच्छे भविष्य और अच्छे घर के लिए करते हैं. पलायन भी कमोबेश बेहतरी के लिए के लिए होता है लेकिन इसमें स्वाभाविक इच्छा या सुनियोजित संकल्प नहीं होता, ये एक विवशता जैसी होती है, इधर कुआं उधर खाई वाली मनःस्थिति भी रहती है, आपके पास अपार विकल्प नहीं होते हैं. विस्थापन इससे भी बुरी स्थिति है. विस्थापित आप कर दिए जाते हैं, आपके हालात ऐसे बना दिए जाते हैं. सत्ताएं आपके संसाधनों और सपनों और घरों से आपको बेघर करती हैं. विकास का जामा पहनकर जो नीतियां स्थानीय जमीन पर उतारी जाती हैं, विस्थापन उनकी एक अंतर्निहित शर्त है या विशेषता. मिसाल के लिए, टिहरी बांध से हुआ विस्थापन आज उससे हुए विकास की तुलना में कितना भारी, असहनीय, भयावह और विकराल है, इसे दोहराने की ज़रूरत नहीं. विस्थापन के आखिरी निष्कर्ष विकास के हर फ़लसफ़े और हर आंकड़ें और हर उठान पर भारी पड़ रहे हैं. उत्तराखंड के पहाड़ों में घर नहीं बचे हैं. ये एक स्वीपिंग स्टेटमेंट नहीं है. ये वास्तविकता है. जो हैं, उन्हें आप अपने शौक में और अपनी तसल्ली में और अपने आंकडो में और अपनी ख़ुशफ़हमियों में घर कहते रहिए.
और जिन ख़ुशियों के लिए आप प्रवासी होते हैं वहां भी सत्ताएं आपको अंततः निचोड़ती ही हैं. आप एक निचुड़ा हुआ पहाड़ होंगे अपने अपने प्रवासों में. आपमें न वैसी नदी होगी न धारे न ताब होगी न वैसे खड़े रह पाना न वो महक न वो हंसी न जंगल. आपमें एक बेतरतीबी होगी लेकिन उसमें स्वाभाविकता नहीं होगी. और जब आपके भीतर पहाड़ पिघलता आ रहा होगा तो इधर भूस्खलन, और कुदरती आफ़तों और सत्ताओ और मुनाफेदारों के नेक्सस से वास्तविक पहाड़ गिर रहे होंगे, ढह रहे होंगे, खिसक और बह रहे होगे. इस तरह दो दुर्घटनाएं एक साथ जारी हैं. पहाड़ और पत्थर और घर इस तरह दो जगहों पर एक साथ गिर रहे हैं. हम क्या करें. क्या बचाएं.
एक पुकार यहां हमेशा बनी रहती है
कोई हमेशा लौट आता है यह जानते हए कि उसे चले जाना है
ख़ुशी रात में एक फूल की तरह खिली होती है
प्रेम रात के गमले में एक पौधे की तरह उगता रहता है
जिसे रोज़ पानी देना होता है धूप में रखना होता है
बेचैनी एक बिल्ली की तरह घूमती है
कभी-कभी दिखती है उसकी ओझल होती हुई पूंछ.
(मंगलेश डबराल, घर की काया)
गांव का मेरा घर बुलाता हुआ सा खड़ा है. ये जैसे बहुत लंबे समय से चले आ रहे युद्ध के किसी ज़ख़्मी की पुकार है. वो मुझसे दो घूंट पानी चाहता होगा. थोड़ी सी हवा. थोड़ी रोशनी. थोड़ा कुछ लोग. कुछ आग. क्या दूं मैं इस घर को. मैं वहां खड़ा हूं और उसकी ओर नहीं अपने नए घर की ओर लौट रहा हूं. जो बहुत दूर शहर में है और वहां सब कुछ है. मैं किस घर का बालक हूं किस घर का मालिक. किस घर को अपना कहूं और किसे छोड़ दूं. क्या वो मेरा घर वहां पर भी भटकता सा खड़ा है और मैं देश दुनिया में घर घर बदलता भटक रहा हूं. क्या मेरा घर मेरे भीतर है. क्या हम दोनों भटकते हैं. क्या मेरा भटकाव ही मेरा घर है.
लोग घर बदलते रहते हैं. घर से निकलते हैं. जीवन बनाने जाते हैं. लौटते भी हैं. कुछ नहीं लौटते हैं. एक जीवन में बहुत सारे घर हो जाते होंगे. बेशक किराए के घरों में भी तो हम रहते हैं. वे भी तो हमारे घर ही हुए. लेकिन वो कौन सा घर होता है जो आपके दिल की सबसे भीतरी गहराइयों में थरथराता रहता है. आप किस घर को सबसे ज़्यादा मिस करते हैं. क्योंकि हर जिस घर में जीवन के विभिन्न वक़्तों में आप रहते होंगे वहां कुछ न कुछ तो ऐसा ज़रूर होगा जो अमिट होगा आपके मन में. उसे कैसे छोड़ देंगे. आपका बचपन, आपकी जवानी, आपके संघर्ष, आपके प्रेम, आपके सपने, आपका परिवार. इतनी सारी कुलबुलाहटें तो ऊन का एक गुच्छा बन जाती हैं. तार तो एक ही है.
बेशक आप हर घर को याद रखना चाहेंगे. लेकिन वो जो अकेला घर आपके भीतर चमकता रहेगा वो तो वही आपका सबसे पहला घर है. आपके गांव का आपके बचपन का आपका पहला घर, सारे घर जैसे उसी घर के भीतर जमा हो जाते हैं. वे जैसे सब कमरे हैं उसी में अपनी जगह बनाते हुए और इस तरह जैसे ये एक बहुत विशाल घर हो गया है. और इस विशाल घर के अंदर कहीं किसी ताखे या खादरे जैसा एक आकार है जो घर है और इस घर को आप नहीं जानते लेकिन वो वहां रखा हुआ है और आपको कुछ याद दिला रहा है. एक बहुत लंबी सुरंग के किसी आख़िरी कोने में दिखता हुआ वो आकार और पीछे चला जाता है जब जब आप उसके नज़दीक पहुंचते हैं. इस तरह शायद आप उस तक कभी पहुंचते नहीं और जाते रहना भी चाहते हैं. जैसा कि सलमान रुश्दी ने लिखा है अपने घर की याद में कि वो खोये हुए समय के कुहासे में खोये हुए शहर का एक खोया हुआ घर है.
शिवप्रसाद जोशी वरिष्ठ पत्रकार हैं और जाने-माने अन्तराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों बी.बी.सी और जर्मन रेडियो में लम्बे समय तक कार्य कर चुके हैं. वर्तमान में शिवप्रसाद देहरादून और जयपुर में रहते हैं. संपर्क: joshishiv9@gmail.com
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