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बिना अनुभव के इस रास्ते में जाना तो साक्षात मौत ही हुई

हिमालय की मेरी पहली यात्रा – 5

(पिछली कड़ियां :
हिमालय की मेरी पहली यात्रा – 1 बागेश्वर से लीती और लीती से घुघुतीघोल
हिमालय की मेरी पहली यात्रा – 2 गोगिना से आगे रामगंगा नदी को रस्सी से पार करना और थाला बुग्याल
हिमालय की मेरी पहली यात्रा – 3 चफुवा की परियां और नूडल्स का हलवा
हिमालय की मेरी पहली यात्रा – 4 परियों के ठहरने की जगह हुई नंदा कुंड)

भगतदा की आवाज मुझे कहीं दूर से आती महसूस जैसी हो रही थी. पिट्ठू को अपने से मुक्त कर हम सभी वहीं पसरते हुए पोर्टरों को धीरे—धीरे आगे संकरे रास्ते में जाते देखते रहे. धूप के बावजूद यहां ठंड एक अजीब सी सिहरन पैदा कर रही थी. आधे घंटे बाद राजदा ने सभी को चलने का इशारा किया तो अनमने ढंग से पिट्ठू को कांधों में डाल आगे बढ़ चले. पगडंडी वाले रास्ते में ज्यों—ज्यों आगे बढ़ रहे थे वह बेहद संकरा होता जा रहा था. घंटे भर बाद हम एक खूबसूरत मखमली बुग्याली रास्ते में थे. मन वहीं रुक जाने का कर रहा था. अब चलने से थकान भी हावी होने लगी थी, लेकिन हमारे गाईड—पोर्टर राशन—तंबू समेत आगे जा चुके थे. उन्हें पकड़ने के लिए सभी ने अपनी चाल तेज कर दी. एक मोड़ के बाद दृश्य खुला तो दाई ओर ऊपर नामिक ग्लेशियर चमकता दिखा. कुछ देर बैठ ही गए उसे निहारने के लिए. (Himalayan Trekking Keshav Bhatt)

उसके दोनों ओर हिमालय की श्रृंखलाएं अपना विस्तार लिए दिखी. आगे बलखाया रास्ता हीरामणि ग्लेशियर में कहीं खोता हुआ सा महसूस हुवा. ग्लेशियर से छनछनाते झरनों का संगीत भला लग रहा था. गले में मैंने रेडियो डाल रखा था और उस शाम के वक्त पुराने गानों ने अलग ही समां बांध रखा था. सधे कदमों से हम सभी नीचे को तिरछा उतर रहे थे. कोहरा छाने लगा तो लगा कि अब रास्ता खो गया है. कोहरे में दूर सामने से भगतदा इशारा कर रास्ता बताने की कोशिश करते दिखे. अचानक राजदा ने मुझे सख्त आवाज में रेडियो बंद करने को कहा. मैंने रेडियो बंद किया तो उन्होंने बताया कि हम ग्लेशियर में हैं. मुझे समझ में नहीं आया कि ग्लेशियर क्या होते हैं और इसमें रेडियो में चल रहे मधुर संगीत को बंद करने की जरूरत क्यों आन पड़ी. मुझे असमंजस में देख उन्होंने अपने कदमों के पास मटमैली जमीन को अपनी आइसऐक्स से मारा तो ठोस बर्फ के कुछ टुकड़े टूट पड़े. मैं हैरान हो देखता रहा. (Himalayan Trekking Keshav Bhatt)

हम सभी हीरामणि ग्लेशियर में खड़े थे. जहां थोड़ी सी चूक खतरनाक हो सकती थी. पहली बार मुझे हिमालय और ग्लेशियर को आत्मसात करने का मौका मिला था. हम सभी सावधानी से ग्लेशियर को पार कर आगे भोजपत्र के घने जंगलों में पहुंचे. एक मैदान में भगतदा ने अपना तंबू खड़ा कर दिया था. वहीं अपना भी तंबू खड़ा कर हम सभी उसमें घुस गए. किलोमीटर तो याद नहीं लेकिन आज चलना काफी हो गया था. थकान सभी के चेहरों में टपक रही थी. दाल—चावल बनाने की प्रक्रिया में राजदा के किस्सों में थकान भी काफूर हो चुकी थी.

सुबह मौसम खुशगवार था. सूरज की किरण से हीरामणि का ललाट तपे सोने की तरह चमक रहा था. हीरामणि ग्लेशियर ऊपर से नीचे तक सफेद ठंडे लावे की एक नदी की तरह जमा दिख रहा था. दाल—भात बना. मेरी भूख थी कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी. मैं चुपचाप भगतदा के तंबू के पास गया. वो भी भोजन कर रहे थे. उन्होंने मुझे औपचारिकता के नाते भोजन करने को कहा तो औपचारिकता को किनारे रख मैं उन्हीं कि थाली में टूट पड़ा. वो प्रेमवश मुझे देखते रहे. हां! ये अलग बात रही कि उसके बाद उन्होंने पूरे ट्रैक में मुझसे फिर कभी खाने के बारे में पूछने की औपचारिकताएं नहीं निभाई.

भगतदा से पता चला कि आगे अब आज खतरनाक और रहस्यमयी बुग्यालों को पार कर सुदमखान तक की यात्रा है, जिसमें रास्ते खुद ही अनुमान से बनाने होते हैं.

भगतदा की बातें सच्ची जैसी लगी जब एक चट्टान से हमें एक—एक कर सरकते हुए निकलना पड़ा. नीचे गहरी खाई की ओर नजर गई तो अजीब सी सिहरन उठ पड़ी. एक—दूसरे को धकेलते हुए हमने वह डरावना रास्ता पार कर ही लिया. हीरामणी के पड़ाव से आगे का रास्ता बुग्याल में तिरछा था. लंबा… अंतहीन ये रास्ता खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था. एकाएक मौसम ने मिजाज बदला और रिमझिम बारिश शुरू होने लगी. बारिश का सामना करने के लिए हर किसी ने अपने—अपने अजीबो गरीब हथियार निकाल लिए. पॉलिथिन का मोड़ा, बरसाती, छोटी फोल्डिंग छाते. मैंने भी बाईक वाला वाटर प्रूफ रेनकोट निकाल पहन लिया. थोड़ी देर में बर्फ के फाहे गिरने शुरू हो गए. चलने में मुझे पायजामा—कोट टाइप के इस रेनकोट से असहज होने लगी. इससे मैं बाहर से कम लेकिन अंदर पसीने से ज्यादा गीला होने लगा था. बर्फबारी कम हुवी तो मैंने इसे उतार फेंका. दोपहर ढल चुकी थी. पेट अंदर को जा—जाकर दहाड़ें मार रहा था. एक समतल जगह में रुके तो आपस में कुछ प्रसाद जैसा बंटने लगा. मुझे भी प्रसाद रूपी पंजरी जैसा कुछ मिला तो मैंने उसे वापस कर दिया. भूख की पीड़ा में, मैं न जाने कितने स्वादिष्ट व्यंजनों का मन ही मन भंजन कर चुका था, और हकीकत में जब ये मिला तो मैं हाई एल्टिट्यूड की सिकनैस का शिकार हो गुस्से में आ चुका था.

मौसम खुला तो मेरा गुस्सा भी काफूर हो चुका था. आगे का रस्ता उतार लिए कुछ किलोमीटर के बाद खत्म हो गया. अब एक मीठी सी हरियाली लिए हुए तीखी चढ़ाई हमारे सामने थी. राजदा ने हमें जैड के आकार में आड़े—तिरछे हो चलने की सलाह दी. ये तरीका मजेदार लगा. सीधी चढ़ाई में सांस बहुत फूल जा रही थी, लेकिन ये तरीका मस्त लगा. किलोमीटर भर की चढ़ाई के बाद सामने का नजारा देखा तो हम सभी वहीं बैठ सामने बुग्यालों में डूबते—उतराते बादलों की मस्तियों को देखते रहे. छोटे—छोटे अल्हड़ से वो बादल उन बुग्यालों की उंची—नीची चोटियों से मस्ती करने में डूबे थे. उन्हें अपने होने न होने का कोई गुमान नहीं था.

बुग्याल में फैली लंबी घास को पकड़ते हुए हम सभी सावधानी से आगे बढ़ रहे थे. भगतदा और उनके साथी कहीं दिख नहीं रहे थे. नीचे की ओर कोहरे ने अपनी दुकान फैलानी शुरू कर दी थी. ऊपर की ओर रास्ता नहीं था, तो हम सभी नीचे की ओर ही उतरने लगे. कोहरा अब घना हो गया था. जाना किधर को है किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था. राजदा ने एक जगह पर हम सभी को रुकने का ईशारा किया, और आगे एक चट्टान में चढ़ रास्ते की खोज में निकले. हम चुपचाप हो बैठ गए. बीसेक मिनट तक सीटियों का दौर चला. चट्टान से वापस आकर राजदा ने बताया कि यहां से रास्ता है नहीं… नीचे गहरी खाई है. अचानक ही कोहरे के बीच नीचे से भगतदा दिखे तो सबकी सांस लौटी. कूदते—फांदते सभी ने उनकी ओर दौड़ जैसी लगा दी. भगतदा के पास पहुंच सभी किनारे पर बैठ गए. भगतदा ने बताया कि वो तो काफी आगे पहुंच चुके थे, फिर कोहरा छाया तो उन्हें वापस आना पड़ा. ये अन्वालों का अपने अनुभव वाला रास्ता हुआ. बिना अनुभव के इस रास्ते में जाना तो साक्षात मौत ही हुई!

जारी)

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बागेश्वर में रहने वाले केशव भट्ट पहाड़ सामयिक समस्याओं को लेकर अपने सचेत लेखन के लिए अपने लिए एक ख़ास जगह बना चुके हैं. ट्रेकिंग और यात्राओं के शौक़ीन केशव की अनेक रचनाएं स्थानीय व राष्ट्रीय समाचारपत्रों-पत्रिकाओं में छपती रही हैं. केशव काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.

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