गायत्री आर्य

तुम ‘हमेशा सफल होने’ के दबाव वाले समय में पैदा हुए हो

4G माँ के ख़त 6G बच्चे के नाम – 55  (Column by Gayatree Arya 55)
पिछली किस्त का लिंक: एक दिन जबड़ों की बजाए तुम्हारी आंखें पढ़ने लगेंगी

तुम यकीन नहीं करोगे रंग, मुझे आज तक एग्जाम के सपने आते हैं. और कभी भी सपने में मैं पूरा पेपर हल नहीं कर पाती, मेरा दिमाग बचपन के एग्जाम फोबिया से निकल नहीं पाया है अभी तक. उफ्फ! वे रिजल्ट के तनाव भरे दिन. मेरा बचपन बेहद-बेहद तनाव में गुजरा है मेरे बच्चे. घर छोड़कर भागने और आत्महत्या करने जैसी बातें मैं छठी-सातवी तक सोच चुकी थी. पर बहुत डरपोक और दब्बू थी मैं, इसीलिए इनमें से कुछ भी नहीं कर पाई. तुम्हारे नाना के बेहद क्रूर व्यवहार, खौफनाक गुस्से और शरीर पर गहरे नील छोड़ने वाली मार के कारण मेरा, बल्कि हम तीनों बहन-भाई का ही बचपन बेहद उजड़ा हुआ बीता है.

मेरे बचपन पर जगह-जगह नीले, गुलाबी, बैंगनी रंग के ‘नील’ उभरे हुए हैं, उऽऽफ्फ! मेरा मासूम सा घायल बचपन. अभी तक दुखता है मेरे बच्चे. कितनी ही बार रोती हूं मैं. बावजूद इसके कि मेरे पिता बेहद ईमानदार, मेहनती, स्वाभिमानी, बहुत दानी, मददगार, अनुशासनप्रिय व्यक्ति हैं. पर मैं सिर्फ उन्हें उनके हिस्से का सम्मान ही दे पाई हूं प्यार नहीं, क्योंकि वे एक हिंसक और क्रोधी (लगभग क्रूर) पिता रहे हैं. न्होंने सिर्फ ‘भर्ता’ का दायित्व बहुत अच्छे से निभाया है पिता का नहीं, कम से कम मैं तो ऐसा ही सोचती हूं.

पिता का प्यार पाने को तुम्हारी मां बहुत भटकी है मेरे बच्चे! और एक जवान लड़की यदि घर से बाहर पिता का प्यार ढूढ़ेगी तो सिर्फ शोषण ही पाएगी और बेवकूफ ही कहलाएगी. तुम्हारी बेवकूफ मां ने कितनी बार ऐसे धोखे खाए हैं मेरे बच्चे. पर कुल मिलाकर मैं बचती गई जैसे-तैसे.

बावजूद इसके कि तुम ‘हमेशा सफल होने’ के दबाव वाले समय में पैदा हुए हो, मैं पूरी कोशिश करूंगी मेरी जान कि तुम एक भयमुक्त, तनावमुक्त, हिंसामुक्त, शोषणमुक्त बचपन बिताओ. मेरा वादा है कि तुम्हारी बचपन की यादें फूलों सी रंग-बिरंगी और महकती हुई होंगी, न कि नील और चोटों से भरी हुई, मेरी तरह! ‘जख्मी बचपन’ एक श्राप है मेरी जान, जो जिंदगी भर हमारा पीछा करता है.  

तुम दोपहर की अच्छी सी नींद लेकर जग गए हो और अपना पसंदीदा काम (होठ चूसना!) कर रहे हो. आजकल तुम अपनी हथेलियों को ऐसे हिलाते हो, जैसे किसी को पास बुलाने के लिए हिलाते हैं, या कुछ खत्म हो जाने पर हिलाते हैं और ऐसा करते हुए तुम अपनी हथेलियों को ही देखते रहते हो. नृत्य करते हुए भी कोई क्या ही देखता होगा अपनी उंगलियों को ऐसे और इतना डूबकर, इतना ठहरकर, इतना मगन होकर, इतनी मोहब्बत से. उफ्फ्फ!

तुम्हारे रिटायर्ड प्रोफेसर नाना और पांचवीं पास नानी में, मैं बिल्कुल तटस्थ होकर तुम्हारी नानी को कहीं ज्यादा शिक्षित, बुद्धिमान, व्यावहारिक, सहिष्णु, पर्यावरण प्रेमी, बेहद कुशल प्रबंधकर्ता और समझदार पाती हूं. बहुत सारी किताबें पढ़ना या ऊंची शिक्षा इन सब खूबियों के लिए बिल्कुल-बिल्कुल जरूरी नहीं है मेरे बच्चे! एक अच्छा इंसान बनने के लिए स्कूल, पढ़ाई, कतई जरूरी नहीं है मेरी जान, क्योंकि मैं देख रही हूं कि शिक्षा का ग्राफ बढ़ने के बावजूद लोगों में इंसानियत, सहिष्णुता घट रही है.
6.45 पी.एम. /30/03/2010

उत्तर प्रदेश के बागपत से ताल्लुक रखने वाली गायत्री आर्य की आधा दर्जन किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में महिला मुद्दों पर लगातार लिखने वाली गायत्री साहित्य कला परिषद, दिल्ली द्वारा मोहन राकेश सम्मान से सम्मानित एवं हिंदी अकादमी, दिल्ली से कविता व कहानियों के लिए पुरस्कृत हैं.

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Sudhir Kumar

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