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पिताओं के निकम्मेपन की वजह से माएं बच्चों के साथ एंजॉय नहीं कर पाती

4G माँ के ख़त 6G बच्चे के नाम – 45  (Column by Gayatree arya 45)

पिछली किस्त का लिंक: अपने मातृत्व और कृतित्व के बीच में पिसती हूं मैं

हर बार तुम्हारा किसी न किसी कारण से रोना या चिड़चिड़ा होना मेरी तंद्रा तोड़ ही देता है. मैं जब-तब मातृत्व और कृतित्व के बीच पिसती हूं. और जब भी इन दोनों के बीच पिसती हूं, हर बार मुझे लगता है पितृत्व का सुख कितना अपार है, सारे द्वंदों से परे,  अलग, सारे अपराधबोधों से ऊपर. जब भी कभी मातृत्व और कृतित्व के द्वन्द में पिसते हुए मैं तुम पर गुस्सा होती हूं या तुम्हारी जरा सी भी उपेक्षा करती हूं, तो मुझे और भी ज्यादा अपराधबोध होने लगता है. मैं मस्ती भरा बहुत ज्यादा समय हर रोज तुम्हारे साथ बिताना चाहती हूं. पर मुश्किल ये है कि दिन का अधिकतर समय घर की सफाई, खाना, दूसरे कामों और तुम्हारी खाने, सफाई की जिम्मेदारियों को पूरा करने में ही खत्म हो जाता है. उस समय मैं तुम्हारे साथ होते हुए भी तुम्हारी उपस्थिति को जरा भी एंजोए नहीं कर पाती, क्योंकि सारा ध्यान तो उन कामों को करने में लगा रहता है. (Column by Gayatree arya 45)

मैं कहूंगी कि बिना नौकरी किये और पूरा दिन घर में तुम्हारे साथ होने के बावजूद भी, मैं तुम्हारा साथ उतना एंजॉय नहीं कर सकी जितना की कर सकती थी और जितना कि मुझे करना चाहिए था. यह पढ़ के तुम्हें शायद बड़ा अटपटा और अविश्वसनीय लगे, पर यही सच है मेरे बच्चे! यदि कोई काम वाली पूरा घर का काम करती, तब मैं तुम्हारे साथ होने वाला एक-एक पल कहीं ज्यादा एंजॉय कर पाती, क्योंकि तब मेरा ध्यान न तो किसी जिम्मेदारी को पूरा करने में होता, न ही मैं तुम्हारे साथ कोई काम इस हड़बड़ी में निबटाती, कि अगला काम खत्म करना है. तब मैं हर एक पल तुम्हें और ज्यादा एंजॉय कर पाती.

पर ये संभव नहीं था हमारे लिए, क्योंकि हम पूरे दिन की कामवाली को अफोर्ड नहीं कर सकते थे. सोचो जरा, ये सुनने में कितना अटपटा है कि मैं तुम्हारा साथ और ज्यादा एंजॉय करने के लिए एक कामवाली पर निर्भर थी. पर ये सच है और ये सिर्फ मेरा सच नहीं है बेटू, ये सारी दुनिया की मांओं का सच है. यह अलग बात है कि वे कभी इस बारे, में सोचती नहीं, बोलती नहीं. पर न बोलने से सच तो नहीं बदल जाता न मेरी जान? तुम इस बात को ऐसे समझ सकते हो कि यदि मांओं को बार-बार बच्चों द्वारा फैलाये जाने वाले घर को न समेटना हो, तो जाहिर है वे बच्चों के घर फैलाने पर कभी रत्ती भर भी गुस्सा नहीं करेंगी. ऐसे में माएं बच्चों के घर फैलाने वाली हरकतों को न सिर्फ बड़ी मासूमियत और हल्के-फुलके तरीके से लेंगी, बल्कि उसे एंजॉय भी कर सकती हैं. बच्चों के साथ मिलकर खिलौने फैलाने में या ऐसा की कुछ और फैलाने में. इस हरकत में न सिर्फ बच्चे और ज्यादा मजे करेंगे, बल्कि मां खुद बहुत एन्जॉय कर सकती है बच्चे जैसी हरकतें कर के. लेकिन चूंकि मां का सारा ध्यान सिर्फ फैले हुए को बार-बार समेटने में लगा होता है, तो वह बच्चे की ऐसी हरकतों को जरा भी एंजॉय नहीं कर पाती जिसमें कि मां का काम बढ़ता हो. बल्कि अक्सर ही बच्चों के खिलौने फैलाने पर मांएं खीज जाती हैं, क्योंकि दिन भर घर समेटते-समेटते वे थक और पक जाती हैं.

ऐसा ही खाना खिलाने में. आजकल के बच्चे खाना खाने में यूं समझ लो कि बस रुला देते हैं. एक से डेढ घंटा जरा सा खाना उनके मुंह में डालने में लग जाता है. इस काम में अक्सर ही मेरा सब्र खत्म हो जाता है. सोचो जरा इतने प्यारे काम को भी मैं अक्सर इसलिए एंजॉय नहीं कर पाती क्योंकि, इसमें भयानक सब्र चाहिए और ऐसा कभी नहीं होता कि कभी-कभी तुम्हारे पिता खुद इस काम को करने की जिम्मेदारी ले लें. कभी मेरे ऊपर किसी दूसरे काम का दबाव होता है, तो मेरे कहने से वे खिला देते हैं. पर बात तो ये है न कि तुम्हारी मां को तो कभी कहना नहीं पड़ता कि बच्चे को खाना खिला दो, फिर तुम्हारे पिता को क्यों कभी खुद से नहीं लगता कि उन्हें भी अपने बच्चे की भूख-प्यास का होश होना चाहिए? उस समय भी नहीं जबकि वे घर पर होते हैं.

ये सारी छोटी-छोटी चीजें हैं मेरी जान, जिनके कारण मैं हर पल तुम्हारे पास होते हुए भी तुम्हारे साथ को उतना ज्यादा एंजॉय नहीं कर सकी जितना कि कर सकती थी और मेरा दावा है कि ये हर मां का दर्द है. पिताओं के निकम्मेपन या कहूं कि पितृत्व को ठीक से न निभा पाने का हरजाना हमेशा ही मांओं को इस तरह भरना पड़ता है कि वे बच्चों के साथ उतना ज्यादा एंजोए नहीं कर पाती जितना कि कर सकती थी. मुझे अफसोस है कि दूसरी मांओं कि तरह तुम्हारे पिता से मेरी भी यही शिकायतें हैं. मेरा तुम्हारे साथ का ज्यादा समय, सिर्फ तुम्हारी अंतहीन जिम्मेदारियों को निभाने में ही निकल गया, न कि तुम्हारे साथ के एक-एक पल को सबसे अच्छे तरीके से एंजॉय करने में.

तुम्हारी क्या गलती है, तुम्हें तो बस मां चाहिए, लेकिन गलती मेरी भी क्या है? बस थोड़ा सा समय ही तो मांगती हूं अपने लिए. मातृत्व और कृतित्व का ये द्वन्द सिर्फ तुम्हारी मां का ही नहीं है. ये उन सारी मांओं का है, जो मातृत्व के साथ-साथ कुछ और कर रही हैं या घर पर हैं लेकिन कुछ करना चाहती हैं. तुम्हारी मौसी इस नौकरी और मातृत्व के बीच जब पिसनी शुरू हुई थी, तो अपनी सेक्शन ऑफिसर तक की नौकरी छोड़ना चाहती थी. जिस नौकरी के लिए उन्होंने अपनी रातें काली की थीं, कांपीटिशन में बैठी थी, अपनों के गुस्से (सलेक्शन होने तक) की शिकार बनी. वो सरकारी नौकरी जो कितनों का सपना होगी, जिसके लिए पता नहीं कितने लोग लाखों की घूस देना चाहेंगे. ऐसी नौकरी वो सिर्फ इसी द्वन्द के चलते पल भर में छोड़ना चाहती थी कि वे अपने बच्चे को समय नहीं दे पा रही. तुम्हारे मामा के समझाने से वे किसी तरह उस नौकरी में टिकी रही. हालांकि बच्चे के बड़े होने पर वे स्वीकार करती हैं कि अच्छा हुआ उस समय नौकरी नहीं छोड़ी.

बच्चे के हिस्से का जो समय नौकरी ने खाया, उसकी पूर्ति कोई नहीं कर सका, कोई कर ही नहीं सकता. इसी अपराधबोध से उबरने के लिए उन्होंने, खुद को बच्चे को ‘क्वालिटी टाइम’ देने का झुनझुना थमाया. लेकिन सच तो यही है बेटू, कि कम से कम 5-6 साल तक बच्चे को ‘क्वालिटी’ के साथ ‘क्वांटिटी टाइम’ भी चाहिए होता है. छोटे बच्चे को क्वालिटी से मतलब नहीं, उन्हें अफरात में समय चाहिए मां का. जहां तक नजर जाए बस मां दिखनी चाहिए. घर के हरेक कोने में, आंगन में, हर एक आवाज पर सिर्फ और सिर्फ मां चाहिए. निःसंदेह अदभुत है यह कल्पना, कि दुनिया में किसी को आपकी इतनी जरूरत है, चाहत है कि हर क्षण, हर तरफ वो सिर्फ आपको ही देखना चाहता है.

लेकिन जिस नौकरी के लिए मां ने कभी दिन-रात एक किये हों, जो उसका ख्वाब रही हो उसे भला एक झटके में कैसे छोड़ा सकता है? तुम्हारी मामी कब से अपने बच्चों को समय न दे पाने के लिए नौकरी से जूझ रही थी और अंततः उन्होंने छोड़ दी. मेरे बच्चे! काश तुम मां (माँओं) के इस द्वन्द को समझ सको. ‘क्वालिटी टाइम’ का झुनझुना हर बार हर किसी को नहीं बहला सकता. एक स्त्री का पूरा दिन या कहूं पूरा जीवन, मातृत्व और कृतित्व के ध्रुवों के बीच दौड़ने में ही खप जाता है और जब तक मातृत्व की जिम्मेदारी की इलास्टिक थोड़ी ढीली होती है, तब तक मांओं के काम के मौके और ऊर्जा चूक जाते हैं.

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उत्तर प्रदेश के बागपत से ताल्लुक रखने वाली गायत्री आर्य की आधा दर्जन किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में महिला मुद्दों पर लगातार लिखने वाली गायत्री साहित्य कला परिषद, दिल्ली द्वारा मोहन राकेश सम्मान से सम्मानित एवं हिंदी अकादमी, दिल्ली से कविता व कहानियों के लिए पुरस्कृत हैं.

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Sudhir Kumar

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