सुन्दर चन्द ठाकुर

खुशी के पीछे भागो, पैसों के पीछे नहीं

जीवन में पैसों की जरूरत पर एक अंग्रेजी का लेख पढ़ रहा था – द नथिंगनेस ऑफ मनी. इस लेख की शुरुआत एक पहेली से की गई है. पहेली कुछ यूं है – अमीरों को वह चाहिए होता है. गरीबों के पास वह होता है. अगर तुम उसे खाओ, तो मर जाओ. और जब तुम मरते हो, तो उसे साथ ले जाते हो. वह क्या है? इस पहेली का जवाब है – कुछ नहीं! यानी अमीरों को ‘कुछ नहीं’ चाहिए होता. गरीबों के पास ‘कुछ नहीं’ होता. अगर तुम ‘कुछ नहीं’ खाओ, तो तुम मर जाते हो और जब तुम मरते हो तो अपने साथ ‘कुछ नहीं’ ले जाते हो.
(Balancing Between Money & Happiness)

इस लेख में चर्चा की गई है कि इंसान को जीवन में कब पैसों के ‘कुछ नहीं’ होने का अहसास होता है. बचपन में हमारे लिए पैसा कुछ नहीं होता. दोस्तों के साथ खेलना ही सबकुछ होता है. पर हमें पता ही नहीं चल पाता कि कब अचानक हमारे लिए पैसा ही सब कुछ हो जाता है और हम सब कुछ छोड़ पैसों के पीछे दौड़ने लगते हैं. हम इस बात से बेफिक्र होते हैं कि दुनिया में हम सब खाली हाथ आए थे और खाली हाथ ही जाएंगे. ज्यादातर लोगों में पैसों के ‘कुछ नहीं’ होने का अहसास तब जागता है, जब उन्हें अचानक आसन्न मृत्यु दिखाई देती है. तब उन्हें समझ नहीं आता कि पीछे दौड़-दौड़कर उन्होंने जो पैसों का अंबार खड़ा किया था, अब उसका क्या करें, क्योंकि मृत्यु के बाद की यात्रा बिना किसी साजो-सामान के होती है. इस पैसे को आप साथ नहीं ले जा सकते. इसीलिए हम बहुत बार देखते हैं कि बेहिसाब अमीर लोगों को बुढ़ापे में समाज सेवा का कीड़ा काटने लगता है.

कोरोना महामारी के दौरान ऐसे भी कुछ धन्ना सेठों के विडियो सामने आए, जिन्होंने अपनी तिजोरी से बोरों में भर-भरकर नोट निकाले और सड़क चलते लोगों को बांट दिए. उन्होंने पहले पैसों को कमाने के वास्ते अपनी दुर्दशा की और अब वे पैसों की दुर्दशा कर रहे थे, क्योंकि यूं अचानक सड़क चलते हाथ लगे पैसे को लोग अपनी लतों को पूरा करने में ही लुटाने वाले थे. सवाल यह है कि क्या पैसों के ‘कुछ नहीं’ होने का राज मृत्यु के आसन्न आने से पहले जाहिर नहीं हो सकता था? क्या ऐसा नहीं हो सकता कि कोई जवान उम्र से ही पैसों की जरूरत के बारे में जान जाए कि किस हद तक वह जरूरी है और किस हद से आगे उसके पीछे भागना पागलपन है. यही वह राज है, जिसे कोई जान जाए, तो अपनी दौड़ की दिशा बदल देता है. वह पैसों के पीछे दौड़ना छोड़ खुशी के पीछे दौड़ना शुरू कर देता है. चौंकिए नहीं.
(Balancing Between Money & Happiness)

जी हां, ये दोनों दौड़ें अलग-अलग हैं. जो पैसों के पीछे दौड़ता है, वह सुबह थोड़ी देर से उठता है, क्योंकि वह पिछले पूरे दिन लगातार काम करने से बेतरह थका हुआ होता है. उसे देर से नींद आती है. वह देर से उठता है और पिछली रात जहां दौड़ छोड़ी थी, वहीं से फिर दौड़ शुरू कर देता है. वह बीवी को पैसा देता है, क्योंकि उसके पास उसे देने को प्यार नहीं होता. वह बच्चों के भविष्य की चिंता करता है, पर बच्चों के साथ बैठता नहीं. वह उनके साथ खेलता नहीं, क्योंकि उसके पास वक्त नहीं होता. पर जो खुशी के पीछे दौड़ता है, वह सुबह जल्दी उठ जाता है. वह जल्दी उठता है, क्योंकि रात में वह जल्दी सो जाता है. वह उठता है और मन को शांत रखने के लिए योग-ध्यान करता है. वह सबसे पहले अपनी सेहत का पूरा खयाल रखता है. उसके चेहरे पर एक अलग किस्म का तेज दिखाई देता है. वह पत्नी के साथ सैर-सपाटे पर जाता है.

समंदर की अटखेलियां करती लहरों को देखते हुए वह हाथ में हाथ लिए गीली रेत पर लंबी दूरियां तय करता है. पत्नी ऐसे पति के लिए अपनी आंखों से ही अगाध प्रेम बरसाती है. वह अपने बच्चों को अपने जीवन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी मान उनकी संतुलित परवरिश का बंदोबस्त करता है. वह लक्ष्मी के महत्व को कम नहीं समझता और पूरे मनोयोग से दफ्तर के काम करता है. खुशी के पीछे भागने वाला खुद भी खुश रहता है और आसपास भी खुशियां ही बिखेरता है. वह पैसों के ‘कुछ नहीं’ होने और ‘सबकुछ’ होने के बीच संतुलन बनाकर चलता है. यही सांसारिक जीवन जीने का सर्वोत्तम तरीका है.
(Balancing Between Money & Happiness)

-सुंदर चंद ठाकुर

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कवि, पत्रकार, सम्पादक और उपन्यासकार सुन्दर चन्द ठाकुर सम्प्रति नवभारत टाइम्स के मुम्बई संस्करण के सम्पादक हैं. उनका एक उपन्यास और दो कविता संग्रह प्रकाशित हैं. मीडिया में जुड़ने से पहले सुन्दर भारतीय सेना में अफसर थे. सुन्दर ने कोई साल भर तक काफल ट्री के लिए अपने बचपन के एक्सक्लूसिव संस्मरण लिखे थे जिन्हें पाठकों की बहुत सराहना मिली थी.

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